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Wednesday, 27 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -10


सर्ग-2 
भाग-4
जन्म-कथा  
सृंगी जन्मकथा

 रिस्य विविन्डक कर रहे, शोध कार्य संपन्न ।

विषय परा-विज्ञान मन, औषधि प्रजनन अन्न ।



विकट तपस्या त्याग तप, इन्द्रासन हिल जाय ।

तभी उर्वशी अप्सरा, ऋषि सम्मुख मुस्काय ।



शोध कार्य के वास्ते, करे स्वयं को पेश ।

ऋषि-पत्नी रखने लगी, उसका ध्यान विशेष ।



इस अतीव सौन्दर्य पर, होते ऋषि आसक्त ।

औषधि प्रजनन शोध पर, अधिक ध्यान अनुरक्त ।



इधर उर्वशी कर रही, कार्य इंद्र का सिद्ध ।

धीरे धीरे ही सही, प्रेम हुआ समृद्ध ।



ऋषि-पत्नी फिर एक दिन, करवा देती व्याह ।

प्रेम-पल्लवन के लिए, खुली चतुर्दिक राह ।



एक वर्ष पश्चात ही,  पुत्र -जन्म हो जाय ।

गई उर्वशी स्वर्ग को, देती उन्हें थमाय ।।



हुवे विविन्डक जी दुखी, पुत्र जन्म के बाद ।

मस्तक पर दो सृंग हैं , सुन विचित्र अनुनाद ।



फिर भी प्यारा पुत्र यह, माता करे दुलार ।

ऋषिवर को पकड़ा रही, खोटी-खरी हजार ।



अपनी खोजों से किया, गलत गर्भ उपचार ।

इसीलिए तो शीश का, है  विचित्र आकार ।।



कोसी तट पर पल रहा, आश्रम का यह नूर ।

 गुप्त रूप से पालते, श्रृंग करें मजबूर ।



सृंगी तेरह वर्ष के, वह सुरम्य वनभाग ।

उच्च हिमालय तलहटी, सरिता झील तड़ाग ।



शिक्षा दीक्षा नियम से, ज्ञान उपासक श्रेष्ठ ।

नारी से अनजान हैं, चिंतित होते ज्येष्ठ ।



सत्पोखर में फिर बसे, रिस्य विविन्डक आय ।

संगम कोसी-गंग का, दृश्य रहा मनभाय ।



सृंगेश्वर की थापना, सृंगी से करवाय ।

देश भ्रमण को ऋषि चले, पत्नी लेकर जाय ।



जोर शोर से फैलता, सृंगेश्वर का नाम ।

राजा रानी शान्ता, आ पहुंचे इक शाम ।।   



मंदिर में तम्बू लगा, करते सब विश्राम ।

शांता रूपा चंचला, घूम रही निष्काम ।



छोटी छोटी बालिका, जाती आश्रम बीच ।

सृंगी अपने कक्ष में, ध्यावें आँखे मीच ।



रूपा की शैतानियाँ, ध्यान हो गया भंग ।

इक दूजे को देख के, सृंगी-शांता  दंग ।।


सृंगी पहली मर्तवा, देखें बाला रूप ।
कन्याओं का वेश भी, उनको लगा अनूप ।। 




सोहे सृंगी सृंग से, शांता के मन भाय।
परिचय देती शान्ता, उनका परिचय पाय ।

बाल सुलभ मुस्कान से, तृप्त हृदय हो जाय ।।
 मातु-पिता के पास फिर, वह उनको ले जाय ।

इन बच्चों को देखकर, होते सभी प्रसन्न ।
सृंगी जी संकोच में,  ग्रहण करें नहिं अन्न ।

तीन दिनों का यह समय, सृंगी के अनमोल ।
सार्वजनिक जीवन हुआ, भाये शांता बोल ।। 



सर्ग-2 समाप्त  

Monday, 25 February 2013

पिस्सू-मच्छर-खटमल Vs जूँ-चीलर

पिस्सू मच्छर तेज हैं, देते खटमल भेज । 
जगह जगह कब्जा करें, खटिया कुर्सी मेज ।  

खटिया कुर्सी मेज, कान पर जूँ  ना रेंगे । 
देते कड़े बयान, किन्तु विस्फोट सहेंगे । 

चीलर रक्त सफ़ेद, लाल तो बहे सड़क पर। 
करके धूम-धड़ाक, चूसते पिस्सू मच्छर।। 
 


Police and pedestrians look on at the site of the bomb blast at Dilsukh Nagar in Hyderabad on Saturday. Photo: AFP
 मसले सुलझाने चला, आतंकी घुसपैठ । 
खटमल स्लीपर सेल सम, रेकी रेका ऐंठ । 

रेकी रेका ऐंठ, मुहैया असल असलहा । 
विकट सीरियल ब्लास्ट, लाश पर लगे कहकहा । 

सत्ता है असहाय, बढ़ें नित बर्बर नस्लें । 
मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले । 
The Prime Minister, Manmohan Singh, being briefed by the Andhra Pradesh Chief Minister, N. Kiran Kumar Reddy, at the site of the bomb blast at Dilsukhnagar in Hyderabad on Sunday. (From left) DGP V. Dinesh Reddy, AP Governor E.S.L. Narasimhan, Union Minister of State for Surface Transport, Sarve Satyanarayana, and the state's Home Minister, Sabitha Indra Reddy, are alos seen. Photo: P.V. Sivakumar

Sunday, 24 February 2013

मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले-

कल रांची प्रवास पर था-



Police and pedestrians look on at the site of the bomb blast at Dilsukh Nagar in Hyderabad on Saturday. Photo: AFP
 मसले सुलझाने चला, आतंकी घुसपैठ । 
खटमल स्लीपर सेल सम, रेकी रेका ऐंठ । 

रेकी रेका ऐंठ, मुहैया असल असलहा । 
विकट सीरियल ब्लास्ट, लाश पर लगे कहकहा । 

सत्ता है असहाय, बढ़ें नित बर्बर नस्लें । 
मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले । 

The Prime Minister, Manmohan Singh, being briefed by the Andhra Pradesh Chief Minister, N. Kiran Kumar Reddy, at the site of the bomb blast at Dilsukhnagar in Hyderabad on Sunday. (From left) DGP V. Dinesh Reddy, AP Governor E.S.L. Narasimhan, Union Minister of State for Surface Transport, Sarve Satyanarayana, and the state's Home Minister, Sabitha Indra Reddy, are alos seen. Photo: P.V. Sivakumar

Saturday, 23 February 2013

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल"-

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
 जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

 हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥ 

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल ॥ 




कल गुरू को मूँदा था, आज चेलों ने रूँदा है-
पिलपिलाया गूदा है ।
छी बड़ा बेहूदा  है । ।

मर रही पब्लिक तो क्या -
आँख दोनों मूँदा है ॥

जा कफ़न ले आ पुरकस
इक फिदाइन कूदा है ।

कल गुरू को मूँदा था
आज चेलों ने रूँदा है ॥

पाक में करता अनशन-
मुल्क भेजा फालूदा है ॥
 

Friday, 22 February 2013

बम फटे हैं बेशक - एलर्ट करते तो हों -




निवेदन  
मात्राएँ बाद में गिनना -
दो पंक्तियाँ आप भी लिखो- 

कल पूरा करंगे-
आज जल्दी में 
 लोग मरते तो हैं । 
जख्म भरते तो हैं ॥ 

बम फटे हैं बेशक -
एलर्ट करते तो हों । 

पब्लिक परेशां लगती 
कष्ट हरते तो हैं ॥ 

 देते गीदड़ भभकी 
दुश्मन डरते तो हैं । 

 दोषी पायेंगे सजा 
हम अकड़ते तो हैं  । 

 बघनखे शिवा पहने -
गले मिलते तो हैं ॥  

कंधे मजबूत हैं रविकर-
लाश धरते तो हैं ।


कल गुरू को मूँदा था, आज चेलों ने रूँदा है-


पिलपिलाया गूदा है । 
छी बड़ा बेहूदा  है । । 
मर रही पब्लिक तो क्या -
आँख दोनों मूँदा है ॥ 

जा कफ़न ले आ पुरकस 
इक फिदाइन कूदा है । 
कल गुरू को मूँदा था 
आज चेलों ने रूँदा है ॥

पाक में करता अनशन-
मुल्क भेजा फालूदा है ॥

Tuesday, 19 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -9


सर्ग-2 
भाग-3
  भाग-3
कन्या का नामकरण
कौशल्या दशरथ कहें, रुको और महराज |
अंगराज रानी सहित, ज्यों चलते रथ साज ||
 
राज काज का हो रहा, मित्र बड़ा नुक्सान |
चलने की आज्ञा मिले,  राजन  हमें  विहान ||
 
सुबह सुबह दो पालकी, दशरथ की तैयार |
अंगराज रथ पर हुए, मय परिवार सवार ||
 
दशरथ विनती कर कहें, देते एक सुझाव |
सरयू में तैयार है,  बड़ी राजसी नाव ||
 
धारा के संग जाइए, चंगा रहे शरीर |
चार दिनों का सफ़र कुल, काहे होत अधीर ||
 
चंपानगरी दूर  है, पूरे दो सौ कोस |
उत्तम यह प्रस्ताव है, दिखे नहीं कुछ दोष ||
 
पहुंचे उत्तम घाट पर, थी विशाल इक नाव |
नाविक-गण सब विधि कुशल, परिचित  नदी बहाव ||
 
बैठे सब जन चैन से, नाव बढ़ी अति मंद |
घोड़े-रथ तट पर चले, लेकर सैनिक चंद ||
 
धीरे धीरे गति बढ़ी, सीमा होती पार |
गंगा में सरयू मिली, संगम का आभार ||
 
चार घरी रूककर वहां, पूजें गंगा माय  |
 कर सरयू की वंदना, देते नाव बढ़ाय ||
 
परम हर्ष उल्लास का, देखा फिर अतिरेक |
ग्राम रास्ते में मिला, अंगदेश का एक || 
 
धरती पर उतरे सभी, आसन लिया जमाय |
नई कुमारी का करें, स्वागत जनगण आय |। 
 
किलकारे कन्या हँसे, कौला रखती ख्याल |
धरती पर धरती कदम, रानी रही संभाल ||
 
उत्तम औषधि वैद्य की, शुभ गुणकारी लेप |
रस्ते भर मलती चली, तीन बार अति घेप ||

नई वनस्पति फल नए, शीतल नई समीर |
खान-पान था कुल नया, नई नई तासीर || 
 
अंग देश की बालिका, मंद-मंद मुसकाय |
कंद-मूल फल प्रेम से, अंगदेश के खाय ||

रानी के संग खेलती, बाला भूल कलेश |
राज काज के काम कुछ, निबटा रहे नरेश ||
 
एक अनोखा वाद था,  ग्राम प्रमुख के पास |
बात सौतिया डाह की, विधवा करती नाश ||
 
सौतेला  इक  पुत्र  है, सौजा  के  दो  आप |
इक खाया कल बाघ ने, करती घोर विलाप  ||
 कुण्डली
फांके हफ़्तों से करे, अपनों से खा मात । 
जिन्दा रहने के लिए, करता वो आघात ।
करता वो आघात, क्षमा रविकर कर देते ।
पर उनका कस शौक, प्राण जो यूँ ही लेते ।
भरे पेट का मौज, तड़पती लाशें ताके ।
दुष्कर्मी बेखौफ, मौज से पाचक फांके ।।


रो रो कर वह बक रही, सौतेले का दोष |
यद्दपि वह घायल पड़ा, करे गाँव अफ़सोस ||
 कुण्डली
ढर्रा बदलेगी नहीं,  रोज अड़ाये टांग ।
खांई में बच्चे सहित, सकती मार छलांग ।
सकती मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।
मात्र सौतिया डाह, चलाये वो परिपाटी  ।
रविकर का अंदाज, लगेगा झटका कर्रा ।
बर्रा प्राकृत दर्प, बदल नहिं पाए ढर्रा ।।
 
जान लड़ा कर खुब लड़ा, हुआ किन्तु बेहोश |
बचा लिया इक पुत्र को, फिर भी न संतोष ||
 
बड़ी दिलेरी से लड़ा, चौकीदार गवाह |
बाघ पुत्र को ले भगा, जंगल दुर्गम राह ||
 
सौजा को विश्वास है, देने को संताप |
सौतेले ने है किया, घृणित दुर्धुश पाप ||
 
घर न रखना चाहती, वह अब अपने साथ |
ईश्वर की  खातिर अभी, न्याय कीजिए नाथ ||


दालिम को लाया गया, हट्टा-कट्टा वीर |
चेहरे पर थी पीलिमा, घायल बहुत शरीर ||
सौजा से भूपति कहें, दालिम का अपराध |
ग्राम निकाला दे दिया, रहे किन्तु हितसाध ||
दालिम से मुड़कर कहें, बैठो जाय जहाज  |
छू ले माता के चरण, मत होना नाराज  ||


कुण्डली
यूँ ही जाते लड़खड़ा, कदम चले जो दूर ।
कहते क्यूँ यह हड़बड़ा, आखिर क्यूँ मजबूर ।
आखिर क्यूँ मजबूर, हकीकत तुम भी जानो ।
गम उसको भरपूर, बात मानो ना मानो ।
कैसे सहे विछोह, आत्मा यह निर्मोही ।
समझ हृदय की पीर, करो ना बातें यूँ  ही ।।

 
राजा पक्के पारखी,  है हीरा यह वीर |
पुत्री का रक्षक लगे, कौला की तकदीर ||

 कुण्डली
ममता में अंधी हुई, अपना पूत दिखाय |
स्वार्थ सिद्ध में लग गई,  गाँव  भाड़ में जाय |
गाँव  भाड़ में जाय, खाय ले सौतन बच्चा |
एक सूत्र पा जाय , चबाती बच्चा कच्चा |
देती हृदय हिलाय, कोप तिल भर नहिं  कमता |
मंद मंद मुसकाय, ठगिन माया से ममता ।।


सेनापति से यूँ कहें, रुको यहाँ कुछ रोज |
नरभक्षी से त्रस्त जन, करिए उसकी खोज ||
 
जीव-जंतु जंगल नदी, सागर खेत पहाड़ |
बंदनीय हैं ये सकल, इनको नहीं उजाड़ ||
 
रक्षा इनकी जो करे, उसकी रक्षा होय |
शोषण गर मानव करे, जाए जल्द बिलोय ||
 
केवल क्रीडा के लिए, मत करिए आखेट |
भरता शाकाहार भी, मांसाहारी पेट ||
 
जीव जंतु वे धन्य जो, परहित धरे शरीर |
हैं निकृष्ट वे जानवर, खाएं उनको चीर ||
 
नरभक्षी के लग चुका, मुँह में मानव खून |
जल्दी उसको मारिये, जनगण पाय सुकून ||
 
अगली संध्या में करें, चंपा नगर प्रवेश  |
अंग-अंग प्रमुदित हुआ, झूमा अंग प्रदेश ||
 
गुरुजन का आशीष ले, मंत्री संग विचार |
नामकरण का शुभ दिवस, तय अगला बुधवार || 
 
नामकरण के दिन सजा, पूरा नगर विशेष |
देवलोक अवलोकता, ब्रह्मा विष्णु महेश ||
 
महा-पुरोहित कर रहे, थापित महा-गणेश |
राजकुमारी आ गई, आये अतिथि विशेष ||
 
रानी माँ की गोद में, चंचल रही विराज |
टुकुर टुकुर देखे सकल, होते मंगल काज ||
 
कौला दालिम साथ में, राजकुमारी पास |
हम दोनों कुछ ख़ास हैं, करते वे एहसास ||
 
महापुरोहित बोलते, हो जाओ सब शांत |
शान्ता सुन्दर नाम है, फैले सारे प्रांत ||
 
शान्ता -शान्ता कह उठा, वहाँ जमा समुदाय |
मात-पिता प्रमुदित हुए, कन्या खूब सुहाय ||
 
कार्यक्रम सम्पन्न हो, विदा हुए सब लोग |
पूँछे कौला को बुला, राजा पाय सुयोग ||
 
शान्ता की तुम धाय हो, हमें तुम्हारा ख्याल |
दालिम लगता है भला, रखे तुम्हे खुशहाल ||
 
तुमको गर अच्छा लगे, दिल में तेरे चाह |
सात दिनों में ही करूँ, तेरा उससे व्याह ||
 
कौला शरमाई तनिक, गई वहाँ से भाग |
दालिम की किस्मत जगी, बढ़ा राग-अनुराग ||
 
दोनों की शादी हुई, चले एक ही राह |
शान्ता के प्रिय बन रहे, राजा केर पनाह ||
 
 कुण्डली
सौम्या सृष्टी सोहिनी, माँ की मंजिल राह ।
सचुतुर, सुखदा, सुघड़ई, दुर्गे मिली अथाह ।
 दुर्गे मिली अथाह, बड़ी आभारी माता ।
ताकूँ अपना अक्श, कृपा कर सदा विधाता ।
हसरत हर अरमान, सफल देखूं इस दृष्टी ।
मंगल-मंगल प्यार, लुटाती सौम्या सृष्टी ।।
 
पोर-पोर में प्यार है, ममतामयी महान ।
कन्या में नित देखती, देवी का वरदान ।।

Friday, 15 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -8

सर्ग-2 
भाग-2
सम गोत्रीय विवाह
फटा कलेजा भूप का, सुना शब्द विकलांग |
सुता हमारी स्वस्थ हो, जो चाहे सो मांग ||

भूपति की चिंता बढ़ी, छठी दिवस से बोझ |
तनया की विकलांगता, कैसे होगी सोझ ||

रात-रात भर देखते, उसकी दुखती टांग |
सपने में भी आ जमे, नटनी करती स्वांग ||

गुरु वशिष्ठ ने एक दिन, भेजा भूप बुलाय |
सह सुमंत आश्रम गए, बैठे शीश नवाय ||

सकल जगत के लो बुला, चर्चित वैद्य-हकीम |
सम्मलेन कर लो खुला, बंधन मुक्त असीम ||

कर के दोनों दंडवत, लौटे निज दरबार |
भेजे हरकारे सकल, समझाकर तिथि-वार ||

पीड़ा बेहद जाय बढ़, अंतर-मन अकुलाय ।
जख्मों की तब नीलिमा, कागद पर छा जाय ।।

 उद्यम करता आदमी, हरदम लागे नीक |
पूजा ही यह कर्म है, बाकी लगे अलीक ||

नीमसार की भूमि पर, मंडप बड़ा सजाय |
श्रावण की थी पूर्णिमा, रही चांदनी छाय ||


रक्षा बंधन पर्व कर, जमे चिकित्सक वीर |
जांच कुमारी की करें, होता विकल शरीर ||

विषय बहुत ही साफ़ था, वक्ता थे शालीन |
सबका क्रम निश्चित हुआ, हुए कर्म में लीन ||

उदघाटन करने चले, अंग-देश के भूप |
नन्हीं बाला का तभी, देखा सौम्य स्वरूप ||

लगी भली वह बालिका, मुख पर छाया तेज |
पैर धरा पर ना पड़े, रखिये  हृदय सहेज ||

स्वागत भाषण पढ़ करें, राज वैद्य अफ़सोस |
जन्म कथा सारी कही, रहे स्वयं को कोस ||

वक्ताओं ने फिर रखी, वर्षों की निज खोज |
सुबह-सुबह चलती रही, परिचर्चा कुछ रोज ||

दूर दूर से आ रहे, प्रतिदिन विषम मरीज |
शिविरों में नित शाम को, करें बैद्य तजबीज ||

भर जीवन सुनता रहे, देखें दर्द अथाह |
एक वैद्य की जिन्दगी,  बड़ी कठिन है राह ।।

चौथे दिन के सत्र में, बोले वैद्य सुषेन |
गोत्रज व्याहों की विकट, महा विकलता देन ||

राजा रानी अवध के, हैं दोनों गोतीय |
अल्पबुद्धि-विकलांगता, सम दुष्फल नरकीय ||

गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रहे व्यर्थ क्यूँ खीज ||

 गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |
 दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

साधु साधु कहने लगे, सब श्रोता विद्वान |
सत्य वचन हैं आपके, बोले वैद्य महान ||

अब तक के वक्ता सकल, करके अति संकोच |
मूल विषय को टाल के, रखें अन्य पर सोच ||

सारे तर्क अकाट्य थे, छाये वहां सुषेन |
भारी वर्षा थम गई, नीचे बैठी फेन ||

आदर से दशरथ कहें, वैद्य दिखाओ राह |
विषम परिस्थिति में हुआ, कौशल्या से ब्याह ||

नहीं चिकित्सा शास्त्र  में, इसका दिखे उपाय |
गोत्रज जोड़ी अनवरत, संतति का सुख खाय ||

 व्याख्या पूरी कर उठे, लंका वैद्य सुषेन |
 रिस्य विविन्डक बोलते,  सभा बीच यूँ  बैन ||

संतति हो ऐसी अगर, झेले अंग-विकार |
गोद किसी की दीजिये, सुधरे शुभ आसार ||

प्रभु की इच्छा से मिटें, कुल शारीरिक दोष |
धन्यवाद ज्ञापन हुआ, होती जय जय घोष ||
सवैया 
गोतज दोष नरेश लगे, तनया विकलांग बनावत है ।
माँ विलखे चितकार करे, कुल धीरज शान्ति गंवावत है ।
वैद गुनी हलकान दिखे, निकसे नहिं युक्ति, बकावत है ।
औध-दशा बदहाल हुई, अघ रावण हर्ष मनावत है ।।


अंगराज श्री  रोमपद , आये दशरथ पास |
अभिवादन करके कहें, करिए नहीं निराश ||

रानी इनकी वर्षिणी, कौशल्या की ज्येष्ठ |
चम्पारानी बोलते, परजा मंत्री श्रेष्ठ ||

  ब्याह हुए बारह बरस, सूनी अब भी गोद |
बेटी प्यारी सौंपिए, मंगल मंगल-मोद ||

दशरथ अब भी सोच में,  कैसे दे दें गोद |
  दिल को गहरे गोद के, करें कसक अनुमोद ??

कौशल्या हामी भरी, करती दिल मजबूत|
 अपनी बहना के लिए, अंग भेजती दूत ||

अंगराज भी खुश हुए, रानी को बुलवाय |
रस्म गोद करके सफल, उनकी गोद भराय ||

अंग-विकृत वो अंगजा, कर ली अंगीकार |
अंगराज दशरथ चले, फिर सुषेन के द्वार || 

 तब सुषेन के शिविर में, पहुंचे अवध नरेश |
चेहरे पर चिंता बड़ी, चर्चा चली विशेष ||

बोले वैद्य सुषेन जी, सुनिए हे महिपाल |
ऐसी संताने सहें,  बीमारी विकराल ||

 गोत्रज शादी को भले, भरसक दीजे टाल |
मंजूरी करती खड़े, टेढ़े बड़े सवाल ||

परिजन लेवे गोद जो, कर दे कन्या-दान |
उल्टा हाथ घुमाय के, खींचें सीधे कान ||

मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय  |
सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

 गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |
संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

सहज रूप से सफल हो, रावण का अभियान |
किया दूर रनिवास से, राजा को यह ज्ञान  ||

आई रानी अंग से,  लाया दूत बुलाय |
कौशल्या के अंग से, ममता बह बह जाय ||

लगे तीन दिन गोद में, साइत शुभ आसन्न |
नया देश माता नई, हुई रीति संपन्न ||

जन्म-दायिनी छूटती, रोवे बुक्का-फार |
दिल का टुकड़ा सौंप दी, महिमा अपरम्पार ||

आठ माह की उम्र में, बदला घर परिवार |
 अंग देश को चल पड़ी, सरयू अवध विसार ||

कौला कौला सी चली, नव-कन्या के संग |
 जननी आती याद तो, करती कन्या तंग ||

 कृतज्ञता करते  प्रगट, कौशल्या के भाव ।
 हृदय-पटल पर डालता, असर सुता अलगाव ।।
कुण्डली 
नेह हमारा साथ है, ईश्वर पर विश्वास |
अन्धकार को चीर के, फैले धवल उजास |
फैले धवल उजास, मिला ममतामय साया |
कुशल वैद्य  जन साथ, हितैषी कौला आया |
शुभकामना असीम, दौड़ ले बिना सहारा   |
 करे अनोखे काम, भूल नहिं नेह हमारा || 
लिंक -

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -1
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -2
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-5

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6-B
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -7

Thursday, 14 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -7

अब-तक 
दशरथ की अप्सरा-माँ स्वर्ग गई दुखी पिता-अज  ने आत्म-हत्या करली । पालन-पोषण गुरु -मरुधन्व  के आश्रम में नंदिनी का दूध पीकर हुआ । कौशल्या का जन्म हुआ-कौसल राज के यहाँ -
रावण ने वरदान प्राप्त किये-कौशल्या को मारने की कोशिश-दशरथ द्वारा प्रतिकार-दशरथ कौशल्या विवाह-रावण के क्षत्रपों का अयोध्या में उत्पात 
सर्ग-2
भाग-1

 कौशल्या भयभीत हो, ताके सम्बल एक । 
  पावे रक्षक भ्रूण का,  फैले शत्रु अनेक || 
 

चारों  दिशा  उदास  हैं,  फैला  है आतंक |
जिम्मेदारी कौन ले,  मारे  दुश्मन  डंक ||  

 

सारे देवी-देवता, चिंतित रही मनाय |

 अनमयस्क फिरती रहे, बैठे मन्दिर जाय  ||



जीवमातृका  वन्दना, माता  के  सम पाल |

जीवमंदिरों को सुगढ़, रखती रही संभाल ||

 

धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |

बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||



माता  करिए  तो  कृपा, करूँ तोर अभिषेक  |

 शत्रु दृष्टि से ले बचा, बच्चा पाऊं नेक ||


 संध्या को रनिवास में, रानी रह-रह रोय |

उच्छवासें भरती रही, अँसुवन धरती धोय ||



दशरथ को दरबार में, हुई घरी भर देर |

कौशल्या नहिं दीखती, अन्दर घुप्प-अंधेर ||



तभी सुबकने की पड़ी, कानों में आवाज |

दासी पर होते कुपित, पूँछ रहे महराज  ||



हुआ उजाला कक्ष में, मुखड़ा लिए मलीन |

रानी लेटी भूमि पर, दिखती अति-गमगीन ||


राजा विह्वल हो गए, संग भूमि पर बैठ |

रानी को पुचकारते, सत्य प्रेम की पैठ ||



 बोलो रानी बेधड़क, खोलो मन के राज |

 कौन रुलाया है तुम्हें, करे कौन नाराज ??
निकले अगर भड़ास तो, बढती जीवन-साँस ।
आँसू बह जाएँ अगर, घटे दर्द एहसास ।। 


 


मद्धिम स्वर फिर फूटता, हिचकी होती तेज |

अपने बच्चे को भला, कैसे रखूं सहेज ||



राजा सुनकर हर्ष से, रानी को लिपटाय |

बोले चिंता मत करो, करूं सटीक उपाय ||



अगली प्रात: वे गए, गुरु वशिष्ठ के पास |

थे सुमंत भी साथ में, जिन पर अति-विश्वास ||



ठोस योजना बन गई, दुश्मन धोखा खाय ||

रानी के इस गर्भ को, जग से रखें छुपाय  ||


अगले दिन दरबार में, आया इक सन्देश |

कौशल्या की मातु को, पीड़ा स्वास्थ-कलेस ||



डोली सजकर हो गई, कौला भी तैयार |

छद्म वेश में सेविका, बैठी अति-हुशियार ||




वक्षस्थल पर झूलता, वही पुराना हार |

जिसको लेकर था भगा, सुग्गासुर अय्यार ||



सेना के सँग हो विदा, डोली चलती जाय |

गिद्धराज ऊपर उड़े, पंखों को फैलाय ||



अभिमंत्रित कर महल को, कौशल्या के पास |

कड़ी सुरक्षा में रखा, दास-दासियाँ ख़ास ||



खर-दूषण के गुप्तचर, छोड़े अपनी खोह |

डोली के पीछे लगे, लेने को तब टोह ||



छद्म-वेश में माइके, धर कौशल्या रूप |

रानी हित दासी करे, अभिनय सहज अनूप ||



वर्षा-ऋतु फिर आ गई, सरयू बड़ी अथाह |

दासी उत्तर में रही, दक्षिण में उत्साह ||


देख सकें औलाद को, हुई बलवती चाह |

दशरथ  सबपर  रख  रहे, चौकस कड़ी निगाह ||



सात मास बीते मगर, गोद-भराई भूल |

कनक महल रक्षित रहा, रानी के अनुकूल ||



पड़ा पर्व नवरात्रि का, सकल नगर उल्लास |

कौशल्या नहिं कर सकी, पर अबकी उपवास ||

 

रानी आँगन में जमी, काया रही भिगोय | 
  शरद पूर्णिमा हो चुकी, अमाँ अँधेरी होय ।। 

हर्षित होता अत्यधिक,  कुटिया में जब दीप ।
विषम परिस्थिति में पढ़े, बच्चे बैठ समीप ।।

माटी की इस देह से, खाटी खुश्बू पाय ।
तन मन दिल चैतन्य हो, प्राकृत जग  हरषाय ।।

कुंडलियाँ  
देह देहरी देहरे,  दो, दो दिया जलाय ।
कर उजेर मन गर्भ-गृह, कुल अघ-तम दहकाय । 
कुल अघ तम दहकाय , दीप दस घूर नरदहा ।
गली द्वार पिछवाड़ , खेत खलिहान लहलहा ।
देवि लक्षि आगमन, विराजो सदा केहरी ।
सुख सामृद्ध सौहार्द, बसे कुल देह देहरी ।। 

किरीट  सवैया ( S I I  X  8 )


झल्कत झालर झंकृत झालर झांझ सुहावन रौ  घर-बाहर ।
  दीप बले बहु बल्ब जले तब आतिशबाजि चलाय भयंकर ।
 दाग रहे खलु भाग रहे विष-कीट पतंग जले घनचक्कर ।
नाच रहे खुश बाल धमाल करे मनु तांडव  हे शिव-शंकर ।।


धीरे धीरे सर्दियाँ , रही धरा को घेर |

शीत लहर चलने लगी, यादें रही उकेर ||



पीड़ा झूठे प्रसव की, होंठ रखे  वो भींच |

रानी सिसकारी भरे, जान सके नहिं नींच ||

 

रानी हर दिन टहलती, करती  नित व्यायाम |

पौष्टिक भोजन खाय के, करे तनिक आराम ||





कोसलपुर में उस तरफ, दासी का वह खेल |

खर-दूषण का गुप्तचर, रहा व्यर्थ ही झेल ||



शुक्ल फाल्गुन पंचमी, मद्धिम बहे बयार |

सूर्यदेव सिर पर जमे, ईश्वर का आभार ||



पुत्री आई महल में, कौशल्या की गोद |

राज्य ख़ुशी से झूमता, छाये मंगल-मोद ||



एक पाख के बाद में, खबर पाय दश-शीस |

खर दूषण को डांटता, सुग्गा सुर पर रीस ||


कन्या के इस जन्म से, रावण पाता चैन |

डपटा क्षत्रपगणों को, निकसे तीखे बैन || 



छठियारी में सब जमे, पावें सभी इनाम |

स्वर्ण हार पाए वहां, दासी का शुभ काम ||

गिद्धराज गिद्धौर को, कर दशरथ का काम |
सम्पाती से जा मिले, करते शोध तमाम ||

नई-नई दूरबीन से, देख सकें अति दूर |
प्रक्षेपित कर यान को, भेजें देश सुदूर ||



मालिश करने के लिए, पहुंची कौला धाय |

छूते ही इक पैर को, सुता रही अकुलाय ||

 


कौशल्या ने वैद्य को, झटपट लिया बुलाय |

जांच परख समुचित करे, रहा किन्तु सकुचाय ||



एक पैर में दोष है, कन्या होय अपंग |

सुनकर अप्रिय वचन यह,  हो कौशल्या दंग ||
लिंक -
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -1
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -2
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3
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मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6
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दिनेश चन्द्र गुप्ता ,रविकर 
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