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Saturday, 19 July 2014

आलोचक चक चक दिखे, सत्ता से नाराज-

आदरणीय!! व्याकरण की दृष्टि से क्या 
यह कुण्डलियाँ छंद खरा उतरता है ?? 

आलोचक चक चक दिखे, सत्ता से नाराज । 
अच्छे दिन आये कहाँ, कहें मिटायें खाज । 

कहें मिटायें खाज, नाज लेखन पर अपने। 
रखता धैर्य समाज, किन्तु वे लगे तड़पने । 

बदलोगे क्या भाग्य ? मित्र मत उत्तर टालो । 
कर दे यह तो त्याग, अन्य का भाग्य सँभालो ॥ 

Monday, 14 July 2014

साधे रविकर स्वार्थ, बंद ना करे सताना -

ताना-बाना बिगड़ता, ताना मारे तन्त्र । 
भाग्य नहीं पर सँवरता,  फूंकें लाखों मन्त्र । 

फूंकें लाखों मन्त्र, नीयत में खोट हमारे । 
खुद को मान स्वतंत्र, निरंकुश होते सारे । 

साधे रविकर स्वार्थ, बंद ना करे सताना । 
कुल उपाय बेकार, नए कुछ और बताना ॥ 

Wednesday, 9 July 2014

रविकर मत कर होड़, मचेगी अफरा-तफरी

फ़री फ़री मारा किये, किया किये तफ़रीह । 
-परजीवी पीते रहे, दारु-रक्त पय-पीह। 

दारु-रक्त पय-पीह, नहीं चिंता कुदरत की। 
केवल भोग विलास, आत्मा भटकी भटकी । 

आगे अन्धा-मोड़, गली सँकरी अति सँकरी । 
रविकर मत कर होड़, मचेगी अफरा-तफरी ॥ 

Tuesday, 1 July 2014

कहीं चाल अश्लील, कहीं कह छोटे कपड़े-

(1)
पड़े हुवे हैं जन्म से, मेरे पीछे लोग । 
मरने भी देते नहीं, देह रहे नित भोग । 

देह रहे नित भोग, सुता भगिनी माँ नानी । 
कामुकता का रोग, हमेशा गलत बयानी । 

कोई देता टोक, कैद कर कोई अकड़े । 
कहीं चाल अश्लील, कहीं पर छोटे कपड़े ॥
(2)

पड़े हुवे हैं जन्म से मेरे पीछे मर्द |
मरने भी देते नहीं, ये जालिम बेदर्द |


ये जालिम बेदर्द, हुआ हर घर बेगाना । 
हैं नाना प्रतिबन्ध, पिता पति मामा नाना । 

मिला नहीं स्वातंत्र्य, रूढ़िवादी हैं जकड़े । 
 पुरुषवाद धिक्कार, देखते रविकर कपड़े ॥