Wednesday, 6 March 2013

निष्फल करना कठिन, दुर्जनों के मनसूबे -

मन सूबे से जिले से, जुड़े पंथ से लोग। 
गर्व करें निज जाति पर, दूजी पे अभियोग। 

दूजी पे अभियोग, बढ़ी जाती कट्टरता । 
रविकर सोच उदार, तभी तो पानी भरता । 

भारी पड़ते दुष्ट, देख सज्जन मन ऊबे । 
सफल निरंतर होंय, दुर्जनों के मनसूबे ॥ 


 गुर्गे-गुंडों में फँसी, फिर रजिया की जान |
जान बूझ कर जानवर, वर का कर नुक्सान |
वर का कर नुक्सान, झाड पर चढ़ा रखा है |
कह कह तुझे महान, स्वाद हर बार चखा है |
स्वार्थ कर रहे सिद्ध, पुन: कांग्रेसी मुर्गे |
नहीं जगत कल्याण, नहीं ये तेरे गुर्गे ||

7 comments:

  1. सरकारी अमला महफ़ूज़ न रहे तो आम आदमी ख़ुद को कैसे महफ़ूज़ महसूस करें ?

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  2. बहुत सुन्दर..

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  3. दुर्जनों के मनसूबे को तोड़ने की कोशिस तो करनी ही पडेगी गुरुदेव.सार्थक प्रस्तुति.

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  4. जब सुरक्षित है नहीं इस मुल्क की सर्कार क्या सुरक्षा वो
    करेगी आम लोंगो की जिन्दगी की बहुत सुन्दर

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  5. कोई भी पार्टी हो सब का एक ही काम - स्वार्थसिद्धि. अच्छी रचना, बधाई.

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  6. वहा बहुत खूब बेहतरीन

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में

    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।


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