न पढ़ें कविता समझकर
झेल अकेले खेल प्रभू के,
रेल ले गई अपने सारे ।
बेटा तो परदेश कमाता,
पहले शेखी सदा बघारे ।।
होली में तनु-मनु का आना,
झाँसी-झाँसा लक-लखनौआ
माँ को अपने साथ ले गई,
भटके तन-मन द्वारे द्वारे ।।
चलो एकला, आया था जस,
सबकी नैया लगी किनारे ।
सपने जीते बना कैरियर,
रविकर तनहा हारे हारे ।।