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Saturday, 30 January 2016

रिश्ते तो रिसते रहे, बन बैठे नासूर-

रिश्ते तो रिसते रहे, बने आज नासूर |
स्वार्थ सिद्ध जिनके हुवे, जा बैठे वे दूर |

जा बैठे वे दूर, स्वयं को यूँ समझाया |
वह तो रविकर फर्ज, फर्ज भरपूर निभाया |

परम्परागत कर्ज, चुकाता अब भी किश्तें |
अश्रु-अर्ध्य हर रोज, भूल ना पाता रिश्ते ||

Wednesday, 21 January 2015

बनकर रहता ख़ास, धूर्त वह रविकर पूरा -

पूरा जब तक गाँठ का, पूरे तब तक ठाठ |
चंट गाँठ के मित्रता, रहे पढ़ाते पाठ |

रहे पढ़ाते पाठ, करे वह सदा दिखावा |
आया आपद-काल, फुर्र हो उसका दावा |

जब तक पाया लाभ, निभा सम्बन्ध अधूरा |
बनकर रहता ख़ास, धूर्त वह रविकर पूरा ||