Thursday, 14 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -7

अब-तक 
दशरथ की अप्सरा-माँ स्वर्ग गई दुखी पिता-अज  ने आत्म-हत्या करली । पालन-पोषण गुरु -मरुधन्व  के आश्रम में नंदिनी का दूध पीकर हुआ । कौशल्या का जन्म हुआ-कौसल राज के यहाँ -
रावण ने वरदान प्राप्त किये-कौशल्या को मारने की कोशिश-दशरथ द्वारा प्रतिकार-दशरथ कौशल्या विवाह-रावण के क्षत्रपों का अयोध्या में उत्पात 
सर्ग-2
भाग-1

 कौशल्या भयभीत हो, ताके सम्बल एक । 
  पावे रक्षक भ्रूण का,  फैले शत्रु अनेक || 
 

चारों  दिशा  उदास  हैं,  फैला  है आतंक |
जिम्मेदारी कौन ले,  मारे  दुश्मन  डंक ||  

 

सारे देवी-देवता, चिंतित रही मनाय |

 अनमयस्क फिरती रहे, बैठे मन्दिर जाय  ||



जीवमातृका  वन्दना, माता  के  सम पाल |

जीवमंदिरों को सुगढ़, रखती रही संभाल ||

 

धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |

बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||



माता  करिए  तो  कृपा, करूँ तोर अभिषेक  |

 शत्रु दृष्टि से ले बचा, बच्चा पाऊं नेक ||


 संध्या को रनिवास में, रानी रह-रह रोय |

उच्छवासें भरती रही, अँसुवन धरती धोय ||



दशरथ को दरबार में, हुई घरी भर देर |

कौशल्या नहिं दीखती, अन्दर घुप्प-अंधेर ||



तभी सुबकने की पड़ी, कानों में आवाज |

दासी पर होते कुपित, पूँछ रहे महराज  ||



हुआ उजाला कक्ष में, मुखड़ा लिए मलीन |

रानी लेटी भूमि पर, दिखती अति-गमगीन ||


राजा विह्वल हो गए, संग भूमि पर बैठ |

रानी को पुचकारते, सत्य प्रेम की पैठ ||



 बोलो रानी बेधड़क, खोलो मन के राज |

 कौन रुलाया है तुम्हें, करे कौन नाराज ??
निकले अगर भड़ास तो, बढती जीवन-साँस ।
आँसू बह जाएँ अगर, घटे दर्द एहसास ।। 


 


मद्धिम स्वर फिर फूटता, हिचकी होती तेज |

अपने बच्चे को भला, कैसे रखूं सहेज ||



राजा सुनकर हर्ष से, रानी को लिपटाय |

बोले चिंता मत करो, करूं सटीक उपाय ||



अगली प्रात: वे गए, गुरु वशिष्ठ के पास |

थे सुमंत भी साथ में, जिन पर अति-विश्वास ||



ठोस योजना बन गई, दुश्मन धोखा खाय ||

रानी के इस गर्भ को, जग से रखें छुपाय  ||


अगले दिन दरबार में, आया इक सन्देश |

कौशल्या की मातु को, पीड़ा स्वास्थ-कलेस ||



डोली सजकर हो गई, कौला भी तैयार |

छद्म वेश में सेविका, बैठी अति-हुशियार ||




वक्षस्थल पर झूलता, वही पुराना हार |

जिसको लेकर था भगा, सुग्गासुर अय्यार ||



सेना के सँग हो विदा, डोली चलती जाय |

गिद्धराज ऊपर उड़े, पंखों को फैलाय ||



अभिमंत्रित कर महल को, कौशल्या के पास |

कड़ी सुरक्षा में रखा, दास-दासियाँ ख़ास ||



खर-दूषण के गुप्तचर, छोड़े अपनी खोह |

डोली के पीछे लगे, लेने को तब टोह ||



छद्म-वेश में माइके, धर कौशल्या रूप |

रानी हित दासी करे, अभिनय सहज अनूप ||



वर्षा-ऋतु फिर आ गई, सरयू बड़ी अथाह |

दासी उत्तर में रही, दक्षिण में उत्साह ||


देख सकें औलाद को, हुई बलवती चाह |

दशरथ  सबपर  रख  रहे, चौकस कड़ी निगाह ||



सात मास बीते मगर, गोद-भराई भूल |

कनक महल रक्षित रहा, रानी के अनुकूल ||



पड़ा पर्व नवरात्रि का, सकल नगर उल्लास |

कौशल्या नहिं कर सकी, पर अबकी उपवास ||

 

रानी आँगन में जमी, काया रही भिगोय | 
  शरद पूर्णिमा हो चुकी, अमाँ अँधेरी होय ।। 

हर्षित होता अत्यधिक,  कुटिया में जब दीप ।
विषम परिस्थिति में पढ़े, बच्चे बैठ समीप ।।

माटी की इस देह से, खाटी खुश्बू पाय ।
तन मन दिल चैतन्य हो, प्राकृत जग  हरषाय ।।

कुंडलियाँ  
देह देहरी देहरे,  दो, दो दिया जलाय ।
कर उजेर मन गर्भ-गृह, कुल अघ-तम दहकाय । 
कुल अघ तम दहकाय , दीप दस घूर नरदहा ।
गली द्वार पिछवाड़ , खेत खलिहान लहलहा ।
देवि लक्षि आगमन, विराजो सदा केहरी ।
सुख सामृद्ध सौहार्द, बसे कुल देह देहरी ।। 

किरीट  सवैया ( S I I  X  8 )


झल्कत झालर झंकृत झालर झांझ सुहावन रौ  घर-बाहर ।
  दीप बले बहु बल्ब जले तब आतिशबाजि चलाय भयंकर ।
 दाग रहे खलु भाग रहे विष-कीट पतंग जले घनचक्कर ।
नाच रहे खुश बाल धमाल करे मनु तांडव  हे शिव-शंकर ।।


धीरे धीरे सर्दियाँ , रही धरा को घेर |

शीत लहर चलने लगी, यादें रही उकेर ||



पीड़ा झूठे प्रसव की, होंठ रखे  वो भींच |

रानी सिसकारी भरे, जान सके नहिं नींच ||

 

रानी हर दिन टहलती, करती  नित व्यायाम |

पौष्टिक भोजन खाय के, करे तनिक आराम ||





कोसलपुर में उस तरफ, दासी का वह खेल |

खर-दूषण का गुप्तचर, रहा व्यर्थ ही झेल ||



शुक्ल फाल्गुन पंचमी, मद्धिम बहे बयार |

सूर्यदेव सिर पर जमे, ईश्वर का आभार ||



पुत्री आई महल में, कौशल्या की गोद |

राज्य ख़ुशी से झूमता, छाये मंगल-मोद ||



एक पाख के बाद में, खबर पाय दश-शीस |

खर दूषण को डांटता, सुग्गा सुर पर रीस ||


कन्या के इस जन्म से, रावण पाता चैन |

डपटा क्षत्रपगणों को, निकसे तीखे बैन || 



छठियारी में सब जमे, पावें सभी इनाम |

स्वर्ण हार पाए वहां, दासी का शुभ काम ||

गिद्धराज गिद्धौर को, कर दशरथ का काम |
सम्पाती से जा मिले, करते शोध तमाम ||

नई-नई दूरबीन से, देख सकें अति दूर |
प्रक्षेपित कर यान को, भेजें देश सुदूर ||



मालिश करने के लिए, पहुंची कौला धाय |

छूते ही इक पैर को, सुता रही अकुलाय ||

 


कौशल्या ने वैद्य को, झटपट लिया बुलाय |

जांच परख समुचित करे, रहा किन्तु सकुचाय ||



एक पैर में दोष है, कन्या होय अपंग |

सुनकर अप्रिय वचन यह,  हो कौशल्या दंग ||
लिंक -
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -1
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -2
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-5

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6-B


दिनेश चन्द्र गुप्ता ,रविकर 
निवेदन :
आदरणीय ! आदरेया  !!
 आपकी सलाह का स्वागत है-

Tuesday, 12 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6-B

कौशल्या के गर्भ की, कैसे रक्षा होय |
दशरथ चिंता में पड़े, आँखे रहे भिगोय ||
 
रहे कुशल नारी सदा, छल ना पायें धूर्त ।
संरक्षित निर्भय रहे, संग पिता-पति पूत ।  
तोते कौवे की बढ़ी, महल पास तादाद |
गिद्धराज की तब उन्हें, आई बरबस याद ।।
 
कौशल्या जब देखती, गिद्धराज सा गिद्ध |
याद जटायू को करे, किया प्यार जो सिद्ध ||

यह मोटा भद्दा दिखे, आत्मीय वह रूप |
यह घृणित चौकस लगे, उसपर स्नेह अनूप ||

गिद्ध-दृष्टि रखने लगा, बदला-बदला रूप |
अलंकार त्यागा सभी, बनकर रहे  कुरूप ||

केवल दशरथ जानते, होकर रहें सचेत |
अहित-चेष्टा में लगे, खर-दूषण से प्रेत ||

सुग्गासुर अक्सर उड़े, कनक महल की ओर |
देख जटायू को हटे, हारे मन का चोर ||

एक दिवस रानी गई, वन-रसाल उल्लास |
सुग्गासुर आया निकट, बाणी मधुर-सुभाष ||

माथे टीका शोभता, लेता शुक मनमोह |
ऊपर से अतिशय भला, मन में रखता द्रोह ||

 मत्तगयन्द सवैया 


  बाहर की तनु सुन्दरता मनभावन रूप दिखे मतवाला ।
साज सिँगार करे सगरो छल रूप धरे उजला पट-काला ।
मीठ विनीत बनावट की पर दंभ भरी बतिया मन काला ।
दूध दिखे मुख रूप सजे पर घोर भरा घट अन्दर हाला ।।

 


 रानी वापस आ गई, आई फिर नवरात |
नव-दुर्गा को पूजती, एक समय फल खात ||

स्नानकुंज में रोज ही, प्रात: करे नहान |
भक्तिभाव से मांगती, माता सम सन्तान ||

सुग्गासुर की थी नजर, आ जाता था पास |
 स्वर्ण-हार लेकर उड़ा, इक दिन वह आकाश ||
 
सुनकर चीख-पुकार को, वो ही भद्दा गिद्ध ||
शुक के पीछे लग गया, होकर अतिशय क्रुद्ध ||

जान बचाकर शुक भगा, था पक्का अय्यार ||
आश्रय पाय सुबाहु गृह, छुपा छोड़ के हार ||

  रानी पाकर हार को, होती हर्षित खूब |
राजा का उपहार वो, गई प्यार में डूब ||
 
 नवमी को व्रत पूर्ण कर, कन्या रही खिलाय  |
 चरण धोय कर पूजती, पूरी-खीर जिमाय ||

'रविकर' दिन का ताप अब, दारुण होता जाय |
पाँव इधर भारी हुए, रानी मन सकुचाय ||

 


अम्बिया की चटनी बने, प्याज पुदीना डाल ।
चटकारे ले न सके,  चिंता से बेहाल  ।। 

अपने गम में लिप्त सब, न दूजे का ख्याल ।
पुतली से रखते सटा, अपने सब जंजाल ।।

हिम्मत से रहिये डटे, घटे नहीं उत्साह |
कोशिश चलने की करो, जीतो दुर्गम राह |

कुण्डली
मन की मनमानी खले,  रक्खो खीँच लगाम ।
हड़-बड़ में गड़बड़ करे, पड़ें चुकाने दाम ।
पड़ें चुकाने दाम, अर्थ हो जाय अनर्गल ।
ना जाने क्या कर्म, मर्म को लगे उछल-कर ।
सदा रखो यह ध्यान, शीर्ष का चुन लो प्राणी ।
अनुगामी बन स्वयं, रोक मन की मनमानी ।।
  सर्ग-1 : समाप्त 

Sunday, 10 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6

अब-तक 
दशरथ की अप्सरा-माँ स्वर्ग गई दुखी पिता-अज  ने आत्म-हत्या करली । पालन-पोषण गुरु -मरुधन्व  के आश्रम में नंदिनी का दूध पीकर हुआ । कौशल्या का जन्म हुआ-कौसल राज के यहाँ -
रावण ने वरदान प्राप्त किये-कौशल्या को मारने की कोशिश-दशरथ द्वारा प्रतिकार-दशरथ कौशल्या विवाह-रावण के क्षत्रपों का अयोध्या में उत्पात 




 भाग-6
रावण का गुप्तचर  
दोहे

असफल खर की चेष्टा, हो बेहद गमगीन |
लंका जाकर के खड़ा,  मुखड़ा दुखी मलीन ||

रावण बरबस पूछता, क्यूँ हो बन्धु उदास |
कौशल्या के गर्भ का, करके सत्यानाश  ||

खर पूछे आश्वस्त हो, भ्रात कहो समझाय |
यह घटना कैसे हुई, जियरा तनिक जुड़ाय ||

रानी रथ से कूदती, चोट
खाय भरपूर |
तीन माह का भ्रूण भी, हो जाता खुद चूर ||

सज्जन खुशियाँ  बांटते, दुर्जन  कष्ट बढ़ाय ।
दुर्जन मरके खुश करे, सज्जन जाय रूलाय ।


खर के सँग फिर गुप्तचर, भेजा सागर पार |
वह सुग्गासुर जा जमा, शुक थे जहाँ अपार ||

हरकारे वापस इधर, आये दशरथ पास |
घटना सुनकर हो गया, सारा अवध उदास ||

विकट मार्मिक कष्टकर, सुना सकल दृष्टांत ।
  असहनीय दुष्कर लगे, होता चित्त अशांत ।

गुरुकुल में शावक मरा, हिरनी आई याद |
अनजाने घायल हुई, चखा दर्द का स्वाद ||

आहों से कैसे भरे, मन के गहरे जख्म ।
मरहम-पट्टी समय के, जख्म करेंगे ख़त्म ।।

अनुमति पाय वशिष्ठ की, तुरत गए ससुरार |
कौशल्या को देखते, नैना छलके प्यार ||

सूरज ने संक्रान्ति से, दिए किरण उपहार |
 कटु-ठिठुरन थमने लगी, चमक उठा संसार ||

दवा-दुआ से हो गई, रानी जल्दी ठीक |
दशरथ के सत्संग से, घटना भूल अनीक ||

कुण्डली
आपाधापी जिंदगी, फुर्सत भी बेचैन।
बेचैनी में ख़ास है, अपनेपन के सैन ।
अपनेपन के सैन, बैन प्रियतम के प्यारे ।
अपनों के उपहार, खोलकर अगर निहारे ।
पा खुशियों का कोष, ख़ुशी तन-मन में व्यापी ।
नई ऊर्जा पाय, करे फिर आपाधापी ।।

विदा मांग कर आ गए, राजा-रानी साथ |
चिंतित परजा झूमती, होकर पुन: सनाथ ||

धीरे धीरे सरकती, छोटी होती रात |
 हवा बसंती बह रही, जल्दी होय प्रभात |

दिग-दिगंत बौराया | मादक  बसंत आया ||
तोते सदा पुकारे |  मैना मन दुत्कारे ||
काली कोयल कूके | लोग होलिका फूंके ||
सरसों पीली फूली | शीत बची मामूली  ||
भौरां मद्धिम गाये  | तितली मन बहलाए ||
भाग्य हमारे जागे | गर्म वस्त्र सब त्यागे || 


पीली सरसों फूलती, हरे खेत के बीच |
 कृषक निराई कर रहे, रहे खेत कुछ सींच ||

पौधे भी संवाद में, रत रहते दिन रात |
गेहूं जौ मिलते गले, खटखटात जड़ जात |।

तरह तरह की जिंदगी, पक्षी कीट पतंग |
जीव प्रफुल्लित विचरते, नए सीखते ढंग ||

कौशल्या रहती मगन, वन-उपवन में घूम ||
धीरे धीरे भूलती, गम पुष्पों को चूम ||
कुण्डली
खिलें बगीचे में सदा, भान्ति भान्ति के रंग ।
पुष्प-पत्र-फल मंजरी, तितली भ्रमर पतंग ।
तितली भ्रमर पतंग, बागवाँ सारे न्यारे ।
दुनिया होती दंग,  आय के दशरथ द्वारे ।
नित्य पौध नव रोप,  हाथ से हरदिन सींचे ।
कठिन परिश्रम होय, तभी तो खिलें बगीचे ।।
कुण्डली
  घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम ।
कमल-कुमुदनी से पटा, पानी पानी काम ।
पानी पानी काम, केलि कर काई कीचड़ ।
रहे नोचते *पाम, काइयाँ  पापी लीचड़ ।
भौरों की बारात, पतंगे जलते मोघे  ।।
श्रेष्ठ विदेही पात, नहीं बन जाते घोंघे ।
  (*किनारी की छोर पर लगी गोटी)
लिंक -
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -1
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -2
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-5


दिनेश चन्द्र गुप्ता ,रविकर 
निवेदन :
आदरणीय ! आदरेया  !!
 आपकी सलाह का स्वागत है-


Friday, 8 February 2013

सदन दहलता ख़ास, किंग को दहला पंजा-




 सत्तावन "जो-कर" रहे,  जोड़ा बावन ताश ।
चौका (4)  दे जन-पथ महल, अट्ठा(8)-"पट्ठा" पास । 


*सिंह इज किंग  

अट्ठा(8)-"पट्ठा" पास, किंग(K) पंजा(5) से  दहला(10)
रानी(Q)नहला(9)जैक(J),  देख 
छक्का(6) मन बहला ।    

*ताजपोशी के लिए नहलाना 

-दुक्की(2) तिग्गी(3)ट्रम्प , हिला ना *पाया-पत्ता ।
खड़ा ताश का महल, चढ़े इक्के(A) पे सत्ता (7)।।
*खम्भा 


File:Bicycle-playing-cards.jpg 
Playing cards - seven — Stock Vector #6675212


लोक-तंत्र

*सराजाम सारा जमा, रही सुरसुरा ^सारि |
सुधा-सुरा चौसर जमा, जाम सुरासुर डारि |

जाम सुरासुर डारि, खेलते दे दे गारी |
पौ-बारह चिल्लाय, जीत के बारी बारी |

जो सत्ता हथियाय, सुधा पी देखे मुजरा  |
 जन-गण जाये हार, दूसरा मद में पसरा ।।
*सामग्री  ^चौपड़ की गोटी

भारतीय लोक-तंत्र


*सराजाम सारा जमा, रही सुरसुरा ^सारि |
सुधा-सुरा चौसर जमा, जाम सुरासुर डारि |



जाम सुरासुर डारि, खेलते दे दे गारी |
पौ-बारह चिल्लाय, जीत के बारी बारी |
जो सत्ता हथियाय, सुधा पी देखे मुजरा  |
 जन-गण जाये हार, दूसरा मद में पसरा ।।
*सामग्री  ^चौपड़ की गोटी 


Wednesday, 6 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-5

अब-तक 
दशरथ की अप्सरा-माँ स्वर्ग गई दुखी पिता-अज  ने आत्म-हत्या करली ।
पालन-पोषण गुरु -मरुधन्व  के आश्रम में नंदिनी का दूध पीकर हुआ ।।
कौशल्या का जन्म हुआ-कौसल राज के यहाँ -
रावण ने वरदान प्राप्त किये-
कौशल्या को मारने की कोशिश-
दशरथ द्वारा प्रतिकार-
दशरथ कौशल्या विवाह  --

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मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -1
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -2
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3


 भाग-5
 रावण के क्षत्रप 
सोरठा
रास रंग उत्साह,  अवधपुरी में खुब जमा |
उत्सुक देखे राह, कनक महल सजकर खड़ा ||


चौरासी विस्तार, अवध नगर का कोस में |
अक्षय धन-भण्डार,  हृदय कोष सन्तोष धन |

पाँच  कोस विस्तार, कनक भवन के अष्ट कुञ्ज |
इतने ही थे द्वार, वन-उपवन बारह सजे ||

शयन-केलि-श्रृंगार, भोजन-कुञ्ज-स्नान-कुञ्ज |
झूलन-कुञ्ज-बहार, अष्ट कुञ्ज में थे प्रमुख ||
 
चम्पक-विपिन-रसाल, पारिजात-चन्दन महक |
केसर-कदम-तमाल, नाग्केसरी-वन विचित्र ||

लवंगी-कुंद-गुलाब, कदली चम्पा सेवती |
  वृन्दावन नायाब, उपवन जूही माधवी || 

घूमें सुबहो-शाम, कौशल्या दशरथ मगन |
इन्द्रपुरी सा धाम, करें देवता ईर्ष्या ||

रावण के उत्पात, उधर झेलते साधुजन |
बैठ लगा के घात, कैसे रोके शत्रु-जन्म ||

मायावी इक दास, आया विचरे अवधपुर |
करने सत्यानाश, कौशल्या के हित सकल ||

चार दासियों संग, कौशल्या झूलें मगन |
उपवन मस्त अनंग, मायावी आया उधर ||

धरे सर्प का रूप, शाखा पर जाकर डटा |
पड़ी तनिक जो धूप, सूर्य-पूर्वज ताड़ते ||

महा पैतरेबाज, सिर पर वो फुफ्कारता |
दशरथ सुन आवाज, शब्द-भेद कर मारते ||  

रावण के षड्यंत्र, यदा-कदा होते रहे |
जीवन के सद-मंत्र, सूर्य-वंश आगे चला ||

गुरु-वशिष्ठ का ज्ञान, सूर्यदेव के तेज से | 
अवधपुरी की शान, सदा-सर्वदा बढ़ रही ||

रावण रहे उदास, लंका सोने की बनी  |
करके कठिन प्रयास, धरती पर कब्ज़ा करे ||

जीते जो भू-भाग, क्षत्रप अपने छोड़ता |
 निकट अवध संभाग, खर-दूषण को सौंप दे || 

खर-दूषण बलवान, रावण सम त्रिशिरा विकट |
डालें नित व्यवधान, गुप्त रूप से अवध में ||

त्रिजटा शठ मारीच, मठ आश्रम को दें जला |
भूमि रक्त से सींच, हत्या करते साधु की || 

कुत्सित नजर गढ़ाय, राज्य अवध को ताकते |
 खबर रहे पहुँचाय, आका लंका-धीश को ||

गए बरस दो बीत, कौशल्या थी मायके |
पड़ी गजब की शीत, 'रविकर' छुपते पाख भर ||

जलने लगे अलाव, जगह-जगह पर राज्य में |
दशरथ यह अलगाव, सहन नहीं कर पा रहे ||

भेजा चतुर सुमंत्र, विदा कराने के लिए |
रचता खर षड्यंत्र, कौशल्या की मृत्यु हित ||


 असली घोडा मार, लगा स्वयं रथ हाँकने ||
कौशल्या असवार, अश्व छली लेकर भगा ||

धुंध भयंकर छाय, हाथ न सूझे हाथ को |
रथ तो भागा जाय, मंत्री मलते हाथ निज ||

कौशल्या हलकान, रथ की गति अतिशय विकट |
रस्ते सब वीरान, कोचवान ना दीखता ||

समझ गई हालात, बंद पेटिका याद थी  |
ढीला करके गात, जगह देख कूदी तुरत ||

लुढ़क गई कुछ दूर, झाड़ी में जाकर छुपी ||
चोट लगी भरपूर, होश खोय बेसुध पड़ी ||

मंत्री चतुर सुजान, दौड़ाए सैनिक सकल |
देखा पंथ निशान, झाड़ी में सौभाग्य से ||

लाया वैद्य बुलाय, सेना भी आकर जमी |
नर-नारी सब धाय, हाय-हाय करने लगे ||

खर भागा उत जाय, मन ही मन हर्षित भया |
अपनी सीमा आय, रूप बदल करके रुका ||

रथ खाली अफ़सोस, गिरा भूमि पर तरबतर |
रही योजना ठोस, बही पसीने में मगर ||

रानी डोली सोय, अर्ध-मूर्छित लौटती |
वैद्य रहे संजोय, सेना मंत्री साथ में ||

दशरथ उधर उदास, देरी होती देखकर |
भेजे धावक ख़ास, समाचार लेने गए ||



दिनेश चन्द्र गुप्ता ,रविकर 

निवेदन :
आदरणीय ! आदरेया  !!
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अपार कृपा होगी ।।

आपने सहयोग दिया-आभार आदरणीय ।।

Tuesday, 5 February 2013

लेकिन पाकिस्तान, हिन्दु का करे कलेवा-



मेवा खा के पाक का, वाणी-कृष्णा-लाल |
ठोके कील शकील नित, वक्ता करे हलाल  |

वक्ता करे हलाल, कमाई की कमाल की |
मनमोहन ले पाल, ढाल यह शत्रु-चाल की |

लेकिन पाकिस्तान, हिन्दु का करे कलेवा |
खावो कम्बल ओढ़, मियाँ सेवा का मेवा ||
माया के वक्तव्य से, रही रियाया रोय ।
भाई का आनन्द भी, जाता तुरत विलोय ।
जाता तुरत विलोय, अरब-पति उसे बनाया ।
लेकिन ये क्या बात, नहीं उसपर अब साया ।
मैडम का इनकार, मुसीबत उसकी भारी ।
छापे को तैयार, कई धाकड़ अधिकारी ।।