पाका घौता आम का, झारखंड बागान |
अपनी ढपली पर फ़िदा, रंजिश राग भुलान |
अपनी ढपली पर फ़िदा, रंजिश राग भुलान |
रंजिश राग भुलान, भला हेमंत भीग ले |
दिल्ली तलक अजान, साथ में कई लीग ले |
बंटवारे की बेर, नक्सली करें धमाका |
हो जाए अंधेर, आम पाका तो पाका ||
खानापूरी हो चुकी, गई रसद की खेप ।
खेप गए नेता सकल, बेशर्मी भी झेंप ।
बेशर्मी भी झेंप, उचक्कों की बन आई ।
ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई ।
भूखे-प्यासे मौत, उठा दुनिया से दाना ।
रहे दुबारा न्यौत, बने फिर मुर्दाखाना ॥
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नंदी को देता बचा, शिव-तांडव विकराल ।
भक्ति-भृत्य खाए गए, महाकाल के गाल ।
महाकाल के गाल, महाजन गाल बजाते ।
राजनीति का खेल, आपदा रहे भुनाते ।
आहत राहत बीच, चाल चल जाते गन्दी ।
हे शिव कैसा नृत्य, बचे क्यूँ नेता नंदी ॥
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तप्त-तलैया तल तरल, तक सुर ताल मलाल ।
ताल-मेल बिन तमतमा, ताल ठोकता ताल ।
ताल ठोकता ताल, तनिक पड़-ताल कराया ।
अश्रु तली तक सूख, जेठ को दोषी पाया ।
कर घन-घोर गुहार, पार करवाती नैया ।
तनमन जाय अघाय, काम रत तप्त-तलैया ।
तक=देखकर
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