Monday, 8 September 2014
सतलुज रावी व्यास, सिंधु झेलम को झेलें-
घाटी की माटी बही, प्राणांतक सैलाब |
कुछ भी ना बाकी बचा, कश्मीरी बेताब |
कश्मीरी बेताब, जान पर फौजी खेलें |
सतलुज रावी व्यास, सिंधु झेलम को झेलें |
राहत और बचाव, रात बिन सोये काटी |
फौजी सच्चे दोस्त, समझ ना पाये घाटी ||
Saturday, 6 September 2014
धर्म-भीरु इस हेतु, डरे प्रभु से यह पगला-
भला भयातुर भी कहीं, कर सकता अपराध ।
इसीलिए तो चाहिए, भय-कारक इक-आध ।
भय-कारक इक-आध, शिकारी खा ना पाये ।
चलता रहे अबाध, शांतिप्रिय जगत बनाये ।
धर्म-भीरु इस हेतु, डरे प्रभु से यह पगला ।
सँभला जीवन-वेग, आचरण सँभला सँभला ।
Tuesday, 12 August 2014
गए गोद में बैठ, मंच पर बैठे सटकर--
गाली देते ही रहे, बीस साल तक धूर्त |
अब गलबहियाँ डालते, सत्ता-सुख आमूर्त |
सत्ता-सुख आमूर्त, देखिये प्यार परस्पर |
गए गोद में बैठ, मंच पर बैठे सटकर |
यह कोसी की बाढ़, इकट्ठा हुवे बवाली |
एक नाँद पर ठाढ़, करें दो जीव जुगाली ||
Saturday, 19 July 2014
आलोचक चक चक दिखे, सत्ता से नाराज-
आदरणीय!! व्याकरण की दृष्टि से क्या
यह कुण्डलियाँ छंद खरा उतरता है ??
आलोचक चक चक दिखे, सत्ता से नाराज ।
अच्छे दिन आये कहाँ, कहें मिटायें खाज ।
कहें मिटायें खाज, नाज लेखन पर अपने।
रखता धैर्य समाज, किन्तु वे लगे तड़पने ।
बदलोगे क्या भाग्य ? मित्र मत उत्तर टालो ।
कर दे यह तो त्याग, अन्य का भाग्य सँभालो ॥
Monday, 14 July 2014
साधे रविकर स्वार्थ, बंद ना करे सताना -
ताना-बाना बिगड़ता, ताना मारे तन्त्र ।
भाग्य नहीं पर सँवरता, फूंकें लाखों मन्त्र ।
फूंकें लाखों मन्त्र, नीयत में खोट हमारे ।
खुद को मान स्वतंत्र, निरंकुश होते सारे ।
साधे रविकर स्वार्थ, बंद ना करे सताना ।
कुल उपाय बेकार, नए कुछ और बताना ॥
Wednesday, 9 July 2014
रविकर मत कर होड़, मचेगी अफरा-तफरी
फ़री फ़री मारा किये, किया किये तफ़रीह ।
-परजीवी पीते रहे, दारु-रक्त पय-पीह।
दारु-रक्त पय-पीह, नहीं चिंता कुदरत की।
केवल भोग विलास, आत्मा भटकी भटकी ।
आगे अन्धा-मोड़, गली सँकरी अति सँकरी ।
रविकर मत कर होड़, मचेगी अफरा-तफरी ॥
Tuesday, 1 July 2014
कहीं चाल अश्लील, कहीं कह छोटे कपड़े-
(1)
पड़े हुवे हैं जन्म से, मेरे पीछे लोग ।
मरने भी देते नहीं, देह रहे नित
भोग ।
देह रहे नित
भोग, सुता भगिनी माँ नानी
।
कामुकता का
रोग
,
हमेशा गलत बयानी ।
कोई देता टोक
, कैद कर कोई
अकड़े
।
कहीं चाल अश्लील, कहीं पर छोटे कपड़े ॥
(2)
पड़े
हुवे हैं जन्म से मेरे पीछे मर्द |
मरने भी देते नहीं, ये जालिम बेदर्द |
ये जालिम बेदर्द, हुआ हर घर बेगाना ।
हैं नाना प्रतिबन्ध, पिता
पति
मामा नाना ।
मिला
नहीं
स्वातंत्र्य, रूढ़िवादी हैं जकड़े ।
पुरुषवाद धिक्कार, देखते रविकर क
पड़े
॥
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