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Tuesday, 20 March 2012

खुद से कर खुद-गर्ज तू , सुधरेंगे हालात-


टट्टू बनी शिकायती, जनता खाए जान ।
धोखे की टट्टी करे, समुचित सकल निदान ।

छोटी छोटी बात पर, मर्मरीक मिमियात ।
भ्रष्ट-घुटाला कालिखें, बड़ी भूलता जात ।
 
*साल साल न सालता, याददाश्त कमजोर ।  
कुण्डा का घड़ियाल अब, कारा रहा अगोर ।
*एक प्रकार की मछली / घाव / गढ़ 

सैकिल से रगड़ी गई, ताकी हाथी दाँत ।
गन्ने सा चूसी गई, फिर से वही जमात ।

झापड़ पहले खा चुकी, कमलनाल का मोह ।
दलदल से बचती फिरी, फँसी अँधेरी खोह ।

रोने से कैसे भरे, तन के गहरे जख्म ।
दवा दुआ कर ले भले, जख्म होयंगे ख़त्म ।

गिरेबान में झांक कर, कर सुधार शुरुवात ।
खुद से कर खुद-गर्ज तू , सुधरेंगे हालात ।।  

Tuesday, 13 March 2012

बैठे भाजप चील, मार न जांय झपट्टा-

उत्तराखंड की परिस्थिति पर
शास्त्री जी के सटीक दोहे  
और 
मेरी कुंडली 
सत्य कटुक कटु सत्य हो, गुरुवर कहे धड़ाक।
दल-दल में दलकन बढ़ी, दल-दलपति दस ताक।

दल-दलपति दस ताक, जमी दलदार मलाई ।
सभी घुसेड़ें नाक, लगे है पूरी खाई ।
 
खाई कुआँ बराय, करो मैया ना खट्टा ।
बैठे भाजप चील, मार न जांय झपट्टा ।। 

"दोहे-दल-दल में सरकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


देवभूमि में आ गया, खण्डित जन आदेश।
गुटबन्दी में फँस गया, सत्ता का परिवेश।१।

बिकने को तैयार हैं, प्रत्याशी आजाद।
लोकतन्त्र का हो रहा, रूप यहाँ बरबाद।२।

जोड़-तोड़ होने लगी, खिसक रहा आधार।
जनपथ के आदेश की, हुई करारी हार।३।

चलने से पहले फँसी, दल-दल में सरकार।
दर्जन भर बीमार हैं, लेकिन एक अनार।४।


Thursday, 1 March 2012

ताकें गोरी छोरियां--

 दोहे 
शिशिर जाय सिहराय के, आये कन्त बसन्त ।
अंग-अंग घूमे विकल, सेवक स्वामी सन्त ।

मादक अमराई मुकुल, बढ़ी आम की चोप ।
अंग-अंग हों तरबतर, गोप गोपियाँ ओप ।।

जड़-चेतन बौरा रहे, खोरी के दो छोर ।
पी पी पगली पीवरी, देती बाँह मरोर ।।

सर्षप पी ली मालती, ली ली लक्त लसोड़ ।
कृष्ण-नाग हित नाचती, सके लाल-सा गोड़ ।।

ओ री हो री होरियां, चौराहों पर साज ।
ताकें गोरी छोरियां, अघी अभय अंदाज ।


कुंडली 

गोरी कोरी क्यूँ रहे, होरी का त्यौहार ।
छोरा छोरी दे कसम, ठुकराए इसरार ।

ठुकराए इसरार, छबीले का यह दुखड़ा ।
फिर पाया न पार, रँगा न गोरी मुखड़ा ।

लेकर रंग पलाश,  करूँ जो जोरा-जोरी ।
डोरी तोड़ तड़ाक,  रूठ जाये ना गोरी ।।

Monday, 10 October 2011

जीवमातृका पञ्च कन्या तो बचा ||

जीवमातृका  वन्दना, माता  के  सम पाल |
जीवमंदिरों को सुगढ़, करती सदा संभाल ||
http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/6/61/Stone_sculpt_NMND_-20.JPG 
शिव और जीवमातृका

धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |
बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||
https://lh3.googleusercontent.com/-ks78KCkMJR4/Tj_QMkR5FTI/AAAAAAAAAPI/PFy_h6xRHYY/bhrun-hatya_417408824.jpg
भ्रूण-हत्या
माता  करिए  तो  कृपा, सातों  में  से  एक |
भ्रूणध्नी माता-पिता,  देते असमय फेंक ||
http://aditikailash.jagranjunction.com/files/2010/06/bhrun-hatya.jpg
भ्रूण-हत्या 
कुन्ती   तारा   द्रौपदी,  लेशमात्र   न   रंच |
आहिल्या-मन्दोदरी , मिटती कन्या-पञ्च |
http://www.barodaart.com/Oleographs%20Mythology/PanchKanya-M(1).jpg
पन्च-कन्या
सातों  माता  भी  नहीं, बचा  सकी  गर  पाँच |
सबकी महिमा  पर  पड़े,  मातु  दुर्धर्ष  आँच |

Monday, 20 June 2011

जीवन-यात्रा : माताजी की जय

समस्या-पूर्ति  मंच  का  आभार | Theory  पढने के बाद
Practical  कर रहा हूँ -- गुरुजनों का आशीर्वाद चाहिए --

मेरा विषय ही सबसे बड़ी समस्या है | जिसे टाल पाना 
नामुमकिन -- निबटना ही पड़ता है, वो भी तुरंत ||
                      (१) 
रक्त से अपने सींचकर, हड्डी दिहिन गलाय |
माँ के दर्शन सर्वप्रथम, मृत्य-लोक में आय ||

पाली - पोसी  प्राण जस, माता सदा सहाय |
ढाई किलो  का जीव यह, सत्तर का हो जय ||
                  "खुड्डी"
माँ के  पैरों का  बना, सर्वोत्तम  शौचालय |
हाथ लगाए बिन हुआ, माताजी  की जय ||

आँखे टिकने लग पड़ी, पापा को पहचान |
उनके कपड़ों का किया कई बार नुक्सान ||

दीदी   मेरी   ले  गई,  बाहर   रही  घुमाय |
मुश्किल मेरे पेट की, उसे समझ न आय ||

पैंजनिया पैरों पड़ी, ठुमुक-ठुमुक खनकाय |
सारी धरती एक सी, रविकर हमें दिखाय ||
                     
दो ईंटों  को  पास  रख, ऐसा दिया सजाय |
बैठे  उटकुरुवा  वहाँ,  असली  खुड्डी पाय ||
                    "खुद-की"
मामा के घर था गया, छुक-छुक गाडी बैठ |
आपन हाथ लगाय ले, मामी  बोली   ऐंठ ||

लौटत में  फिर हो गया, रविकर पेट ख़राब |
मीठा कम नमकीन जल, पिए बहुत से डाब ||

कई  दिनों  के  बाद  में, रुके  थे  मेरे  दस्त |
करते करते  था  हुआ,  बुरी तरह से पस्त ||
                     
फूफा के घर शहर में, मुश्किल पड़ी अजीब |
आफत में थी जान जब, नाली दिखी करीब ||
                     "टट्टी"
अगले दिन फुफ्फी कही, घर की टट्टी देख |
उधर  कमाने के लिए,   आती  काकी  नेक ||

भरता  कोई  है  इधर , करता  कोई  और |
चार- दिनन के बाद ही, छोड़ चले वो ठौर ||

रिश्तों की  पूंजी  जमा,  मनुआ  धीरे  खर्च | 
एक-एक को ध्यान से, ख़ुशी-ख़ुशी  संवर्त ||
                    "मैदान"
बाबा की आँखे  हुईं, थोड़ी  और ख़राब |
मुझको ड्यूटी दे हटे,  मेरे  भाई -साब ||

सुबह-सुबह उठकर गया, बाबा के संग खेत |
नितक्रिया उस खेत को,  उपजाऊ कर देत ||

अब आदत पड़ने लगी, घर से बाहर जाय |
दुनियादारी ध्यान से,  बाबा  रहे  सिखाय ||

सौ तक की गिनती हुई, ए बी सी  डी याद |
वर्णमाला भी रट लिया, चार माह के बाद ||

गलती लेकिन हो गई, लगा मुझे इक रोज |
बगुली लेकर हाथ में,  रहे  मौलवी  खोज ||
                     
पाँच साल का हो गया,  कपडे लेता डाल |
बैठे-ठाले करे नित, घर  में  नए  बवाल ||

भैया   कक्षा   पाँच  में,   मेरी  कक्षा  एक |
अमरूदों  के  बाग़  में, लिए  गुरूजी  देख ||

हुई  सुतैया बड़न  की, कांप रहे  थे गात |
मुर्गे की लख दुर्दशा , समझा सारी बात ||

देख भयंकर दृश्य ये,  होने लगी मरोड़ |
बड़े-दोस्त के साथ में गए तलौआ दौड़ ||
                   "तालाब"
पर पानी के पास में, ठिठके  मेरे  पैर |
मुर्गे को छुट्टी मिली,  लेने पहुँचा खैर||

भैया बोले बोल  क्या,  बोलेगा घर बात |
शौचा दो पहले मुझे, मेरी क्या औकात ||
                 
एक साल  बीता गए,   भैया   बड़-स्कूल |
अपने पैरों फाँकता , इधर-उधर की धूल ||

स्वावलम्बी मै हो चला, दोस्त बने दो-चार |
खेलों  में  करते  मजा,  बड़ा मस्त व्यवहार ||

एक बार तालाब  में,  फिसला  मेरा  पैर |
मित्र खींच लाया मगर, कुशलपूर्वक तैर ||

बाबा के आशीष  से,  यह बच्चा  हुशियार |
दिन दूनी बढ़ता गया, गुरु-जनों का प्यार || 

मिडिल किया था पास तब, पास नहीं स्कूल |
दूर साइकिल  से  चला,   सीखे  ट्रैफिक रुल ||

दसवी  कक्षा  में  लगा, सेन्टर  काफी  दूर  |
घर से बाहर प्रथमतः ,  रहने को  मजबूर ||
                    "स्वावलंबन"
नहर  नदी  तालाब  में, निपटे  बार हजार |
गए अयोध्या फिर पढ़न, होकर दसवीं पार || 

इन्टर   पढने   के   लिए,   पहुंचे   फैजाबाद |
प्रभु-कृपा  से  हो  गया, गुरु  से  इक  संवाद ||

जीवन का क्या लक्ष्य है, मन में  करो विचार |
छोटी -  छोटी   मंजिलें,   करते  जाओ  पार ||

सपने  खुब  देखो  मगर, रहे  हकीकत  मूल |
उनको  पाने  के  लिए,  करो न लेकिन भूल || 

सुबह-सुबह की क्लास में, हुई एक दिन देर || 
अगले दिन फिर आ गया, जल्दी बड़े सवेर ||

शौचालय  ढूंढा  उधर,  देखा   बड़का   हाल |
अरे ! निबटने के लिए, जी का सब जंजाल ||

लगा समझने में समय, पर सुविधा भरपूर |
काकी को फुरसत मिली,  हुई समस्या दूर ||
 जारी है