Thursday, 15 September 2011

सी एम् पद की दाल, गले न संघ नाव पर

 





संघ-नाव पर बैठकर, मोदी और बघेल |
सालों शाखा में गए,  खेले  संघी खेल |

खेले संघी खेल,  'कुरसिया'  लगे खेलने |
कांगरेस - पापड़ा , बघेला  बड़े  बेलने |

करत नजर-अंदाज, 'माम'  नाराज दाँव-पर |
सी एम्  पद की दाल, गले न संघ नाव पर ||

Monday, 12 September 2011

मिले राम-माया नहीं

लेता देता हुआ तिहाड़ी, पर सरकार बचा ले कोई

 पर एक टिप्पणी के  सम्मान में--

 G.N.SHAW said... 

अर्थ के साथ दोहे तो सोने पर सुहागा जैसा ! 

दिग्गी को छोड़ दिए , जो " अमर " राग अलाप रहा !  बधाई गुप्ता जी ! 

(१)


आँखे - माखू   दूसता,  संघ - हाथ  बकवाद || 
अर्जुन का यह औपमिक, है औरस  औलाद |
है  औरस  औलाद,  कभी  बाबा  के  पीछे ,
अन्ना  की  हरबार, करे  यह  निंदा  छूछे |
सौ मिलियन का मद्य, नशे में अब भी राखे,
बड़का लीकर किंग, लाल रखता है आँखे ||
(२)
आतंकी  की  प्रशंसा ,  झेले  साधु-सुबूत 
जहल्लक्षणा जाजरा,  महा-कुतर्की पूत |
महा-कुतर्की पूत, झाबुआ  रेप  केस  में,
दोषी  हिन्दू-संघ, बका  था  कहीं द्वेष में |
भागा भागा फिरा, किया  भारी  नौटंकी,
लिया जमानत जाय,  चाट कर यह आतंकी ||
(३)
क्रूर तमीचर सा बके, साधु-जनों  पर खीज || 
तम्साकृत चमचा गुरु, भूला समझ तमीज |
भूला समझ तमीज, बटाला  मोहन  शर्मा,
कातिल नहीं  कसाब , बताता   है  बे-धर्मा |
 कहे करकरे  साब,  मारता  हिन्दू-लीचर ,
पागल  करे  प्रलाप, विलापे  क्रूर-तमीचर ||
 (४)
वो माया के  फेर में, करे राम अपमान,
मिले राम-माया नहीं, व्यर्थ लड़ाए जान|
व्यर्थ लड़ाए जान, बुड़ाया  अपनी गद्दी,
 गले नहीं जब दाल, करे तरकीबें भद्दी |
 बोला तब युवराज, अशुभ है इसका साया,
हूँ मुश्किल में माम, बड़ी टेढ़ी वो माया ||

Saturday, 10 September 2011

लेता देता हुआ तिहाड़ी, पर सरकार बचा ले कोई

माननीय प्रतुल वशिष्ठ जी
की महती कृपा !!
उनका विश्लेषण भी पढ़ें |

आलू   यहाँ   उबाले   कोई  |
बना  पराठा  खा  ले  कोई ||
आलू उबाला तो जनता ने था... लेकिन पराठा नेताजी खा रहे हैं.


तोला-तोला ताक तोलते,
सोणी  देख  भगा  ले कोई |
मौके की तलाश में रहते हैं कुछ लोग ...
जिस 'सुकन्या' ने विश्वास किया ..
उस विश्वास के साथ 'राउल' ने घात किया.


 
जला दूध का छाछ फूंकता
छाछे जीभ जला ले कोई |
हमने कांग्रेस को फिर-फिर मौक़ा देकर अपने पाँव कुल्हाड़ी दे मारी...
हे महाकवि कालिदास हमने आपसे कुछ न सीखा!


जमा शौक से  करे खजाना 
आकर  उसे  चुरा ले कोई ||
काला धन जमा करने वाले इस बात को समझ नहीं रहे कि
विदेशी चोरों को जरूरत नहीं रही चुराने की... अब वे घर के मुखियाओं को मूर्ख बनाना जान गये हैं... धन की बढ़ती और सुरक्षा की भरपूर गारंटी देकर वे उस घन का प्रयोग करते हैं... शास्त्र कहता है 'धन का उपयोग उसके प्रयोग होने में है न कि जमा होने में.'


लेता  देता  हुआ  तिहाड़ी
पर सरकार बचा ले कोई ||
लेने वाले और देने वाले दोनों तिहाड़ में पहुँचे ...
लेकिन उनके प्रायोजकों पर फिलहाल कोई असर नहीं... यदि कुछ शरम बची होगी तो शर्मिंदगी जरूर होती होगी... जो कर्म दोषी करार हुआ उसका फ़ल (सरकार का बचना) कैसे दोषमुक्त माना जाये?
... वर्तमान सरकार पर जबरदस्त जुर्माना होना चाहिए और इन सभी मंत्रीवेश में छिपे गद्दारों को कसाब के साथ काल कोठारी बंद करना चाहिए... ये सब के सब उसी पंगत में खड़े किये जाने योग्य हैं.

"रविकर" कलम घसीटे नियमित
आजा  प्यारे  गा  ले  कोई ||
रविकर जी, आपको लगता होगा कि आप कलम यूँ ही घसीट रहे हैं...
हम जानते हैं कि ये जाया नहीं जायेगा.... आपका श्रम आपकी साधना फलदायी अवश्य होगी.
दिनकर जी पंक्तियों में कहता हूँ :
कुछ पता नहीं, हम कौन बीज बोते हैं.
है कौन स्वप्न, हम जिसे यहाँ ढोते हैं.
पर, हाँ वसुधा दानी है, नहीं कृपण है.
देता मनुष्य जब भी उसको जल-कण है.
यह दान वृथा वह कभी नहीं लेती है.
बदले में कोई डूब हमें देती है.
पर, हमने तो सींचा है उसे लहू से,
चढ़ती उमंग को कलियों की खुशबू से.
क्या यह अपूर्व बलिदान पचा वह लेगी?
उद्दाम राष्ट्र क्या हमें नहीं वह देगी?

ना यह अकाण्ड दुष्कांड नहीं होने का
यह जगा देश अब और नहीं सोने का
जब तक भीतर की गाँस नहीं कढ़ती है
श्री नहीं पुनः भारत-मुख पर चढती है
कैसे स्वदेश की रूह चैन पायेगी?
किस नर-नारी को भला नींद आयेगी?...

 क्लिक --अमर दोहे

Tuesday, 6 September 2011

अमर दोहे




 Sanjay Dutt, Manyata and Amar Singh
व्यर्थ  सिंह  मरने  गया,  झूठ  अमर  वरदान,
दस जनपथ कैलाश से, सिब-बल अंतरध्यान |
इतना  रुपया  किसने  दिया ? 
 
फुदक-फुदक के खुब किया, मारे कई सियार,
सोचा था खुश होयगा, जन - जंगल सरदार |
जिन्हें लाभ वे कहाँ ??


साम्यवाद के स्वप्न को, दिया बीच से चीर,
बिगड़ी घडी बनाय दी, पर बिगड़ी तदबीर  |
परमाणु समझौता 


अर्गल गर गल जाय तो, खुलते बन्द कपाट,
जब मालिक विपरीत हो, भले काम पर डांट |
हम तो डूबे, तम्हें भी ---

दुनिया  बड़ी  कठोर है , एक  मुलायम  आप,
परहित के  बदले  मिला,  दुर्वासा  सा  शाप |
मुलायम सा कोई नहीं 
 
खट    मुर्गा   मरता  रहे,  अंडा  खा   सरदार,
पांच साल कर भांगड़ा, जय-जय जय सरकार |
Mulayam Singh Yadav






Sunday, 4 September 2011

मीरा रही जगाय--


Photo: Dusk descends on a herd of buffalo 

चारा  अब  चारा  नहीं, चारो  और  चुहाड़ |
खाते   पीते   लूटते,   जाय   कठौता  फाड़ |





जाय कठौता फाड़,  मवेशी दिन भर ढोवै |
कदम कदम पर रोज, रात मा  कांटे बोवै |




मीरा  रही  जगाय,  जगाये गोकुल सारा |
सोवै  घोडा   बेंच,  मरे  काहे  बे-चारा ??

Friday, 2 September 2011

किरण-केजरीवाल का, खेला करो खराब |

(१)
सरकारी बन्धुआ मिले, फ़ाइल रक्खो दाब,
किरण-केजरीवाल का, खेला करो खराब | 

खेला करो खराब, बहुत उड़ते हैं दोनों --
न नेता न बाप,  पटा ले जायँ करोड़ों  | 

  कह सिब्बल समझाय, करो ऐसी मक्कारी,
    नौ पीढ़ी बरबाद,  डरे कर्मी-सरकारी ||

(२)
 खाता बही निकाल के, देखा मिला हिसाब,
 फंड में लाखों हैं जमा, लोन है  लेकिन साब |  

लोन है लेकिन साब, सूदखोरों सा जोड़ा,
   निकले कुल नौ लाख, बचेगा नहीं भगोड़ा |

   अफसर नेता चोर, सभी को एक बताता |
 फँसा केजरीवाल, खुला घपलों का खाता ||

धन्यवाद  वीरू-भाई  
धन्यवाद गाफिल जी

Thursday, 1 September 2011

दर्शन-प्राशन पर टिप्पणी

नयन से चाह भर, वाण मार मार कर
ह्रदय के आर पार, झूरे चला जात है |

नेह का बुलाय लेत, देह झकझोर देत
झंझट हो सेत-मेत, भाग भला जात है |

बेहद तकरार हो, खुदी खुद ही जाय खो
पग-पग पे कांटे बो, प्रेम गीत गात है |

मार-पीट करे खूब, प्रिय का धरत रूप
नयनों से करे चुप, ऐसे आजमात  है ||