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Thursday, 12 January 2017

विश्व हिंदी दिवस। शुभकामनायें


रोमन में हिन्दी लिखी, रो मन बुक्का फाड़।
देवनागरी स्वयं की, रही दुर्दशा ताड़।
रही दुर्दशा ताड़, दिखे मात्रा की गड़बड़।
पाश्चात्य की आड़, करे अब गिटपिट बड़ बड़।
सीता को बनवास, लगाये लांछन धोबन।
सूर्पनखा की जीत, लिखें खर दूषण रोमन।।



तप गृहस्थ करता कठिन, रविकर सतत् अबाध।
संयम सेवा सहित वह , सहिष्णुता ले साध।



Tuesday, 27 December 2016

सैंटा देता नोट तो, मोदी लेता छीन


दाढ़ी झक्क सफेद है, लेकिन फर्क महीन।
सैंटा देता नोट तो, मोदी लेता छीन।
मोदी लेता छीन, कमाई उनकी काली।
कितने मिटे कुलीन, आज तक देते गाली।
हुई सुरक्षित किन्तु, कमाई रविकर गाढ़ी।
सुखमय दिया भविष्य, बिना तिनके की दाढ़ी।।

Sunday, 25 December 2016

रविकर निर्मल हास्य, प्रार्थना पूजा विनती-

(1)

विनती सम मानव हँसी, प्रभु करते स्वीकार।
हँसा सके यदि अन्य को, करते बेड़ापार।
करते बेड़ापार, कहें प्रभु हँसो हँसाओ।
रहे बुढ़ापा दूर, निरोगी काया पाओ।
हँसी बढ़ाये उम्र, बढ़े स्वासों की गिनती।
रविकर निर्मल हास्य, प्रार्थना पूजा विनती।।


(2)

बानी सुनना देखना, खुश्बू स्वाद समेत।
पाँचो पांडव बच गये, सौ सौ कौरव खेत।
सौ सौ कौरव खेत, पाप दोषों की छाया।
भीष्म द्रोण नि:शेष, अन्न पापी का खाया ।
लसा लालसा कर्ण, मरा दानी वरदानी।
अन्तर्मन श्री कृष्ण, बोलती रविकर बानी।।


(3)

कंधे पर होकर खड़ा, आनन्दित है पूत।
बड़ा बाप से मैं हुआ, करता पेश सुबूत।
करता पेश सुबूत, बाप बच्चे से कहता।
और बनो मजबूत, पैर तो अभी बहकता।
तुझको सब कुछ सौंप, लगाऊंगा धंधे पर।
बड़ा होय तब पूत , चढ़ूगा जब कंधे पर।।

Monday, 19 December 2016

मैं तो रही बुझाय, आग पर डालूं पानी


पानी भर कर चोंच में, चिड़ी बुझाये आग ।
फिर भी जंगल जल रहा, हंसी उड़ाये काग।
हंसी उड़ाये काग, नहीं तू बुझा सकेगी।
कहे चिड़ी सुन मूर्ख, आग तो नहीं बुझेगी।
किंतु लगाया कौन, लिखे इतिहास कहानी।
मैं तो रही बुझाय, आग पर डालूं पानी ।।

Monday, 12 December 2016

लो कुंडलियां मान, निवेदन करता रविकर


क्षरण छंद में हो रहा, साहित्यिक छलछंद।
किन्तु अभी भी कवि कई, नीति नियम पाबंद।
नीति नियम पाबंद, बंद में भाव कथ्य भर।
शिल्प सुगढ़ लय शुद्ध, मिलाये तुक भी बेह'तर।
लो कुंडलियां मान, निवेदन करता रविकर।
मिला आदि शब्दांश, अंत के दो दो अक्षर।।

Monday, 24 October 2016

किन्तु मार के लात, रुलाती अब औलादें-


लादें औलादें सतत, मातायें नौ माह।
लात मारती पेट में, फिर भी हर्ष अथाह।
फिर भी हर्ष अथाह, पुत्र अब पढ़ने जाये।
पेट काट के बाप, उसे नौकरी दिलाये।
पुन: वही हालात, बची हैं केवल यादें।
किन्तु मार के लात, रुलाती अब औलादें।।

Friday, 7 October 2016

बहू खोजता रोज, कुंवारा बैठा पोता

पोता जब पैदा हुआ, बजा नफीरी ढोल ।
नतिनी से नफरत दिखे, दिखी सोच में झोल।
दिखी सोच में झोल, परीक्षण पूर्ण कराया |
नहीं कांपता हाथ, पेट पापी गिरवाया ।
कह रविकर कविराय, बैठ के बाबा रोता |
बहू खोजता रोज, कुंवारा बैठा पोता ।।