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Thursday, 26 June 2014

बैठा जाये दिल मुआ, कैसे बैठा जाय-

बैठा जाये दिल मुआ, कैसे बैठा जाय |
उठो चलो आगे बढ़ो, अब आलस ना भाय |

अब आलस ना भाय, अगर सुरसा मुँह बाई |
झट राई बन जाय, ताक मत राह पराई |

उद्यम करता सिद्ध, बिगड़ते काम बनाये |
धरे हाथ पर हाथ, नहीं अब बैठा जाये ||

11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 28 जून 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. वाह ! बहुत दिनों बाद ..

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  3. अपना हाथ जगन्नाथ .....खूब कहा......

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-06-2014) को "ये कौन बोल रहा है ख़ुदा के लहजे में... " (चर्चा मंच 1658) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  5. आभार भाई साहब आपकी टिप्पणियों का। बहुत बढ़िया लिखा है आपने :

    उद्यम करता सिद्ध, बिगड़ते काम बनाये |
    धरे हाथ पर हाथ, नहीं अब बैठा जाये ||

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  6. बहुत सार्थक प्रस्तुति...

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  7. उद्यम करता सिध्द.

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  8. शुक्रिया आपकी निरंतर टिप्पणियों का कैसे हो भाई साहब (रविकर भाई ,मैं यहां अपलैंड व्यू ,कैण्टन मिशिगन में हूँ नवंबर मध्य तक .

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  9. उद्यम करता सिद्ध, बिगड़ते काम बनाये |
    अच्छी रचना मत भूल रे प्राणी उद्दम ही करम है तो यही धर्म है

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