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Saturday, 28 June 2014

सात समंदर पार, चली रविकर अधमाई-

पुरानी रचना 
पाई नाव चुनाव से, खर्चे पूरे दाम |
लूटो सुबहो-शाम अब, बिन सुबहा नितराम |
बिन सुबहा नितराम, वसूली पूरी करके |
करके काम-तमाम, खजाना पूरा भरके |
सात समंदर पार, चली रविकर अधमाई |
थाम नाव पतवार,  जमा कर पाई पाई  ||

लाज लूटने की सजा, फाँसी कारावास |
देश लूटने पर मगर,  दंड नहीं कुछ ख़ास |
दंड नहीं कुछ ख़ास, व्यवस्था दीर्घ-सूत्रता |
विधि-विधान का नाश, लोक का भाग्य फूटता । 
बेचारा यह देश, लगा अब धैर्य छूटने । 
भोगे जन-गण क्लेश, लगे सब लाज लूटने ॥ 



6 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-06-2014) को "सबसे बड़ी गुत्थी है इंसानी दिमाग " (चर्चा मंच 1660) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. क्या बात है प्रजातंत्र के भारतीय रंगों की :

    लाज लूटने की सजा, फाँसी कारावास |
    देश लूटने पर मगर, दंड नहीं कुछ ख़ास |
    दंड नहीं कुछ ख़ास, व्यवस्था दीर्घ-सूत्रता |
    विधि-विधान का नाश, लोक का भाग्य फूटता ।
    बेचारा यह देश, लगा अब धैर्य छूटने ।
    भोगे जन-गण क्लेश, लगे सब लाज लूटने ॥

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