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Wednesday, 9 July 2014

रविकर मत कर होड़, मचेगी अफरा-तफरी

फ़री फ़री मारा किये, किया किये तफ़रीह । 
-परजीवी पीते रहे, दारु-रक्त पय-पीह। 

दारु-रक्त पय-पीह, नहीं चिंता कुदरत की। 
केवल भोग विलास, आत्मा भटकी भटकी । 

आगे अन्धा-मोड़, गली सँकरी अति सँकरी । 
रविकर मत कर होड़, मचेगी अफरा-तफरी ॥ 

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा आज गुरूवार (10-07-2014) को 'उम्मीदें और असलियत { चर्चा - 1670 } पर भी है !
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आदरणीय नमस्ते,
    सुंदर रचना...

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  3. अफरा-तफरी तो मची हुई है..

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  4. सुन्दर प्रस्तुति...

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  5. बहुत सुन्दर...

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  6. सुन्दर प्रस्तुति ..न जाने कब इस अंधे मोड़ से मुक्ति मिल पायेगी
    जय श्री राधे
    भ्रमर ५

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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