Follow by Email

Monday, 10 October 2011

" तटस्थ रहना पाप नहीं "

 दिव्य   युध्द से   अनु  प्रेरित 

झगड़ा-झंझट को झटक, झूलन-झगरू चूम |
मध्यस्थी  के  मर्म  में,   घोंपे  चाक़ू  झूम |

घोंपे  चाक़ू  झूम,   रीति  है  झारखण्ड  में -
झगड़े में मत घूम,  कटेगा फिरी-फण्ड  में |
नक्सल छ: इंच छोटा करेगा 
या
पुलिस एंकाउन्टर कर देगी
जीत उसी की होय, बन्धु  दम  जिसका तगड़ा |
 जरा  दूर  से  देख,  बड़े  मल्लों  का  झगड़ा ||


तर्क-संगत टिप्पणी की पाठशाला--

 "क्षमा -याचना सहित"
हर  लेख  को  सुन्दर कहा,  श्रम  को  सराहा हृदय से, 
अब  तर्क-संगत  टिप्पणी  की  पाठशाला  ले  चलो ||
Traditional Roses Mala
खूबसूरत  शब्द  चुन  लो,  भावना  को  कूट-कर के
माखन-मलाई में मिलाकर, मधु-मसाला  ले  चलो  |

http://static.panoramio.com/photos/original/5316683.jpg




विज्ञात-विज्ञ  विदोष-विदुषी  के विशिख-विक्षेप मे |
इस वारणीय विजल्प पर, इक विजय-माला ले चलो |
वारणीय=निषेध करने योग्य     विजल्प=व्यर्थ बात      विशिख=वाण  
      विदोष-विदुषी=  निर्दोष विदुषी                 विज्ञात-विज्ञ= प्रसिध्द विद्वान 

    

क्यूँ   दूर  से  निरपेक्ष  होकर,  हाथ  करते  हो  खड़े -
ना आस्तीनों  में  छुपाओ,  तीर - भाला  ले  चलो ||

टिप्पणी के गुण सिखाये, आपका अनुभव सखे,
चार-छ: लिख कर के  चुन लो, मस्त वाला ले चलो ||

लेखनी-जिभ्या जहर से जेब में रख लो, बुझा कर -
हल्की सफेदी तुम चढ़ाकर,  हृदय-काला  ले  चलो |

टिप्पणी जय-जय करे,  इक लेख पर दो बार हरदम-
कविता अगर 'रविकर' रचे तो, संग-ताला ले चलो |

17 comments:

  1. जीत उसी का हक़, पक्ष जो भाई तगड़ा |
    जरा दूर से देख, बड़े मल्लों का झगड़ा ||
    खूबसूरत !एक से बढ़के एक अंदाज़ आपके माहौल की सहज अभिव्यक्ति .सुन्दर कसावदार शब्द श्या .

    ReplyDelete
  2. अच्छी तुकबंदी बढ़िया लगी,समय मिले तो मेरे ब्लॉग आपका स्वागत है....

    ReplyDelete
  3. डा. अनुराग और डा दिव्या के झगडे पर
    तटस्थ रहने वालों को कोसा गया था ||
    वहीँ से प्रकट हुई है यह तुकबंदी ||
    आभार ||

    ReplyDelete
  4. गुप्ता जी छुट्टी पर रहने की वजह से - पिछले पोस्ट पर अनुपस्थित रहा ! आज सभी को पढ़ा ! देर ही सही - मनु को जन्म दिन की बहुत - बहुत शुभ कामनाएं !मल्लो की झगडा भी गजब है ! सभी पोस्ट लाजबाब है ! बधाई !

    ReplyDelete
  5. क्या बात है! वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई

    ReplyDelete
  6. अति सुन्दर प्रस्तुति.
    विवेक-पूर्ण विचार.
    धन्यवाद.
    आनन्द विश्वास.

    ReplyDelete
  7. इस काव्य का शिल्प और अर्थ लाजवाब है।

    ReplyDelete
  8. आपकी इस तुकबंदी के भी कायल हो गए. सुंदर प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  9. बढ़िया तुकबंदी...प्रस्तुति भी सुन्दर|

    ReplyDelete
  10. क्यूँ दूर से निरपेक्ष होकर, हाथ करते हो खड़े -
    ना आस्तीनों में छुपाओ, तीर - भाला ले चलो ||

    बहुत सार्थक अभिव्यक्ति... सादर...

    ReplyDelete
  11. शीर्षक अधिक अच्छा लगा।
    दोहों से कवि के काव्य प्रतिभा का ज्ञान होता है। विचारो से तटस्थ..क्यों कि शीर्षक अधिक अच्छा है।

    ReplyDelete
  12. भैया दूर से देखने की नसीहत सही है और बुज़ुर्ग आदमियों को दूर से ही देखना भी चाहिए लेकिन घुस के देखने का मज़ा कुछ अलग ही है।

    कोई दूर से लेता है कोई क़रीब से लेता है
    मेरा रक़ीब है जो मज़े वो अजीब से देता है


    क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ?

    ReplyDelete