Follow by Email

Tuesday, 12 August 2014

गए गोद में बैठ, मंच पर बैठे सटकर--

गाली देते ही रहे, बीस साल तक धूर्त |
अब गलबहियाँ डालते, सत्ता-सुख आमूर्त |

सत्ता-सुख आमूर्त, देखिये प्यार परस्पर |
गए गोद में बैठ, मंच पर बैठे सटकर |

यह कोसी की बाढ़, इकट्ठा हुवे बवाली |
एक नाँद पर ठाढ़, करें दो जीव जुगाली ||

8 comments:

  1. इसी का नाम तो राजनीति है !

    ReplyDelete
  2. एक मुहावरा सुना था -थूक कर चाटना ,तब इसका अर्थ टीक से समझ में नहीं आया था.

    ReplyDelete
  3. यह कोसी की बाढ़, इकट्ठा हुवे बवाली |
    एक नाँद पर ठाढ़, करें दो जीव जुगाली ||

    अरे वह क्या मारा है दो सांडों को दो कथित छद्म सेकुलरों को .

    ReplyDelete


  4. यह कोसी की बाढ़, इकट्ठा हुवे बवाली |
    एक नाँद पर ठाढ़, करें दो जीव जुगाली ||

    बहुत सुन्दर है रविकर भाई।

    ReplyDelete