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Saturday, 19 July 2014

आलोचक चक चक दिखे, सत्ता से नाराज-

आदरणीय!! व्याकरण की दृष्टि से क्या 
यह कुण्डलियाँ छंद खरा उतरता है ?? 

आलोचक चक चक दिखे, सत्ता से नाराज । 
अच्छे दिन आये कहाँ, कहें मिटायें खाज । 

कहें मिटायें खाज, नाज लेखन पर अपने। 
रखता धैर्य समाज, किन्तु वे लगे तड़पने । 

बदलोगे क्या भाग्य ? मित्र मत उत्तर टालो । 
कर दे यह तो त्याग, अन्य का भाग्य सँभालो ॥ 

5 comments:

  1. अब खुजली का किया जा सकता है ? दवा भी नहीं बनी है ऐसी खाज के लिये । खुजियाते ही रहना है लगे रहेंगे ।सत्ता अपनी जगह खुजली अपनी जगह दोनो अपनी अपनी जगह ।

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 20/07/2014 को "नव प्रभात" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1680 पर.

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  3. इस खाज का कोई इलाज नहीं!

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  4. आप तो कुण्डलिया छन्द के माहिर हो।
    हमें तो अच्छी लगी।
    गुण-दोष आप देखिए।

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  5. हम तो बस आनंद ले रहे हैं इस खाज का ...

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