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Saturday, 6 September 2014

धर्म-भीरु इस हेतु, डरे प्रभु से यह पगला-

 भला भयातुर भी कहीं, कर सकता अपराध । 
इसीलिए तो चाहिए,  भय-कारक इक-आध । 

भय-कारक इक-आध, शिकारी खा ना पाये । 
चलता रहे अबाध, शांतिप्रिय जगत बनाये । 

धर्म-भीरु इस हेतु, डरे प्रभु से यह पगला । 
सँभला जीवन-वेग, आचरण सँभला सँभला । 

8 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति रविवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. अति सुन्दर कुण्डलियाँ

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  3. सार्थक कुण्डलिया मित्र।
    आभार।

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  4. यह वाकई हिन्दुस्तान का निरूपण है।

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