Showing posts with label आक्रोश. Show all posts
Showing posts with label आक्रोश. Show all posts

Sunday, 30 July 2017

कहो ब्याह का हेतु क्या, दूल्हे से हो प्रश्न-


काया को देगी जला, देगी मति को मार।
क्रोध दबा के मत रखो, यह तो है अंगार।
यह तो है अंगार, क्रोध यदि बाहर आये।
आ जाये सैलाब, और सुख शान्ति बहाये।
कभी किसी पर क्रोध, अगर रविकर को आया।
सिर पर पानी डाल, बदन पूरा महकाया।।


फेरे पूरे हो गये, खत्म हुआ जब जश्न।
कहो ब्याह का हेतु क्या, दूल्हे से हो प्रश्न।
दूल्हे से हो प्रश्न, किया है मस्ती खातिर।
उत्तर सुनकर बोल पड़ी फिर दुल्हन शातिर।
चढ़ जाये जब ढेर, उतारे कौन सवेरे।
इसीलिए तो आज, लगाये मैनै फेरे।।


एक दोहा
डॉक्टर
सख्त जरूरत है तुम्हे, करो आज आराम।
लो गोली देना खिला, बीबी को इस शाम।।


Friday, 13 April 2012

वह कसाब अब कृष्ण, बाप दो-दो जो पाया -

खाया छप्पन जान खुद, मेहमान शैतान ।
सत्ता हिन्दुस्तान की, लगती पाक समान ।

 
लगती पाक समान
, जनक इक इसे जन्मता ।
पालनकर्ता जनक, दिखाता बड़ी नम्रता ।


 
वह कसाब अब कृष्ण, बाप दो-दो जो पाया ।
छप्पन भोग लगाय, अभी भी नहीं अघाया  ।। 

Saturday, 7 April 2012

नहीं देखते दोष, स्वार्थ में रविकर अंधे-

अंधे का क्या दोष है, दुनिया नहीं दिखाय ।
मन के नैनो से लखे, गाए खाय-कमाय ।।


गाए खाय-कमाय, काम में अंधा  मानव।
देखे विना विवेक, बने तत्क्षण ही दानव ।


दिखे न कोई श्रेष्ठ, करें मद-गोरख-धंधे ।
नहीं देखते दोष, स्वार्थ में रविकर अंधे ।।  


Sports Illustrated: In 2001, Erik became the first blind man to climb Mt.Everest.

Saturday, 24 March 2012

ताजमहल बनवाय, करो भैया निपटारा -

आरा,जागरण संवाददाता: करीब 18 सालों से भोजपुर पुलिस की फाइलों में मृत एक महिला शुक्रवार को अचानक जिंदा मिली। आरोपियों की सूचना पर खुद पुलिस ने महिला को बरामद किया। बाद में उसे कोर्ट के समक्ष भी प्रस्तुत किया गया। अगर पुलिस की मानें तो इस कांड में नये सिरे से अनुसंधान के लिए माननीय न्यायालय से अनुमति मांगी जायेगी। ताकि बेगुनाहों को न्याय मिल सके।
भागी थी इक प्रेमिका, शाहजहाँ परवीन ।
जिसकी हत्या की खबर, लेती खुशियाँ छीन ।

लेती खुशियाँ छीन, फँसा परिवार बिचारा ।
कुल अट्ठारह वर्ष, भोगता दुर्गम कारा ।

उसको जिन्दा पाय, चढ़ा सिस्टम पर पारा ।
ताजमहल बनवाय, करो भैया निपटारा ।। 

Thursday, 22 March 2012

राज गुरू सिरमौर, राज से हारे हारे-


Bhagat-Singh-Sukhdev-Rajguru
 ताजम-ताजा मामला, जाती पब्लिक भूल ।
बात पुरानी हो गई, अब क्या देना तूल । 

अब क्या देना तूल, भगत सुखदेव विचारे ।
राज गुरू सिरमौर, राज से हारे हारे ।

डंका कुल संसार, शहीदे आजम बाजा । 
ये पब्लिक सरकार, भूलते ताजम-ताजा । 

Saturday, 17 March 2012

घातक ज्वर का वार, गार्जियन हुआ बावला-


 पूरब से आती खबर, करे कलेजा चाक ।
शूर्पनखा सरकार की, कटी हमेशा नाक ।  
 
कटी हमेशा नाक, करे न ठोस फैसला ।
घातक ज्वर का वार, गार्जियन हुआ बावला ।
 
सूझे नहीं उपाय, रही संतानें खाती ।
मारे है तड़पाय, खबर पूरब से आती ।

Monday, 17 October 2011

फाड़ेंगे इस बार, जानवर नासिर तेरे -

नासिर  तेरे टीम  में,  कुछ  पप्पी अंग्रेज |
गेंद पकड़नी भूल कर, पिच पर उलझें तेज  |
Praveen Kumar struck in his first over
पिच  पर उलझें तेज,  भले  थे  तेरे  डंकी |
घर के ही तुम शेर,  चले ना इत नौटंकी |
   
Virat Kohli reaches his hundred as India race to victory
चोटिल थे तब शेर, शेर अब घायल मेरे |
फाड़ेंगे  इस  बार,   जानवर  नासिर  तेरे ||

Sunday, 28 August 2011

अग्नि वेश धरे शिखंडी-वेश

war 

स्वामी फिर पकड़ा गया, धरे शिखंडी-वेश,
सिब्बल  के  षड्यंत्र से, धोखा खाता देश,

http://www.firstpost.com/wp-content/uploads/2011/08/agnivesh-reuters1.jpg
 

धोखा खाता देश, वस्त्र भगवा का दुश्मन,
टीमन्ना  से द्वेष, कराता उनमे अनबन,



http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/7/7b/Donkey_1_arp_750px.jpg
 

अग्नि का उद्देश्य, पकाता अपनी खिचड़ी,
 है धरती पर बोझ, बुनाये जाला-मकड़ी ||

Saturday, 2 July 2011

नासमझ सास

नाज  न  पकावै  वा  तौ  नाज  दिखावै है   
लाज  न  आवै  बहू   बाज  न  आवै   है |

झपिया झाँझन झुल्नी   झुलका पहिन के
झाँव-झाँव, झकझोर, झमकत  धावै  है  |
 

छनकाय-मनकाय    कहीं भी  छुछुआय 
खट्टा खखोर करिके, खटिया  पसरावै है |

मिथ्या मिमियाय के , झलना झुलाय कर
पति-आवै जान पावै , पातुर पति-आवै है ||

 


Monday, 27 June 2011

शहीद का प्रलाप -विलाप

पंजाब एवं  बंग आगे,  कट चुके हैं  अंग आगे|
लड़े  बहुतै  जंग  आगे,  और  होंगे  तंग  आगे|
हर गली तो बंद आगे, बोलिए, है क्या उपाय ??
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

सर्दियाँ ढलती  हुई हैं,  चोटियाँ  गलती हुई हैं |
गर्मियां  बढती हुई हैं,  वादियाँ  जलती हुई हैं |
गोलियां चलती हुई हैं, हर तरफ आतंक छाये --
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

सब दिशाएँ  लड़ रही हैं,   मूर्खताएं  बढ़ रही हैं 
|

नियत नीति को बिगाड़े, भ्रष्टता भी समय ताड़े |
विषमतायें नित उभारे, खेत  को  ही मेड खाए |
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

 मंदिरों में मकड़ जाला,  हर पुजारी  चतुर लाला | 
 भक्त की बुद्धि पे ताला,  *गौर  बनता  दान  काला |  *सोना
 जापते  रुद्राक्ष  माला,   बस  पराया  माल  आए--
 व्यर्थ हमने सिर कटाए,  बहुत ही अफ़सोस, हाय !

हम फिरंगी से  लड़े  थे  , नजरबंदी  से  लड़े   थे |
बालिकाएं मिट रही हैं , गली-घर में  लुट रही हैं  |
होलिका बचकर निकलती, जान से प्रह्लाद जाये --
व्यर्थ हमने सिर कटाए,  बहुत ही अफ़सोस, हाय !

बेबस, गरीबी रो रही है, भूख, प्यासी सो रही है  |
युवा पहले से पढ़ा पर , ज्ञान  माथे  पर चढ़ाकर |   
वर्ग  खुद  आगे  बढ़ा  पर ,  खो चुका संवेदनाएं |
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय !

है  दोस्तों से यूँ घिरा,   न पा सका उलझा सिरा |
पी रहा वो मस्त मदिरा, यादकर के  सिर-फिरा |

गिर गया कहकर गिरा,   भाड़  में  ये  देश जाए|
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय ! 


त्याग जीवन के सुखों को,  भूल  माता  के  दुखों को |
प्रेम-यौवन से बिमुख हो, मातृभू हो स्वतन्त्र-सुख हो |

क्रान्ति की  लौ  थे  जलाए,  गीत  आजादी  के  गाये |
व्यर्थ हमने सिर कटाए, बहुत ही अफ़सोस, हाय ! 

Saturday, 25 June 2011

मनमे अतीत की याद लिए फिरते है

निज अंतर में उन्माद लिए फिरते हैं 

उन्मादों में अवसाद लिए फिरते हैं

अंदर ही अन्दर झुलस रही है चाहें
मनमे अतीत की याद लिए फिरते है
               बेकस का कोमल हृदय जला करता है
              निशदिन उनका कृष-गात धुला करता है
               दुखों    की   नाव    बनाये  नाविक -
               दुर्दिन  सागर  पर  किया  करता है

औसत से दुगुना भार लिए फिरते हैं
संग में कितनों का प्यार लिए फिरते हैं
यदि किसी भिखारी ने उनसे कुछ माँगा
भाषण का शिष्ट -आचार लिए फिरते हैं

            जो सुरा-सुंदरी पान किया करते हैं
           'कल्याण' 'सोमरस' नाम दिया करते हैं
           चाहे कितना भी चीखे-चिल्लाये जनता
           वे कुर्सी-कृष्ण का ध्यान किया करते हैं

विविध दोहे

दोहा-खोर

स्वतन्त्र - दोहे

Thursday, 23 June 2011

कोख नोचते कुक्कुर-चीते -

           शोक-वाटिका की ऐ सीते !
           राम-लखन के तरकश रीते ||
जगह-जगह जंगल-ज्वाला , उठे धुआँ काला-काला|
प्रर्यावरण - प्रदूषण  ने, खर - दूषण  प्रतिपल  पाला || 
          कुम्भकरण-रावण जीते - 
          राम-लखन के तरकश रीते||
नदियों में मिलते नाले, मानव-मळ मुर्दे डाले |
'विकसित' की आपाधापी, बुद्धि पर लगते ताले||
          भाष्य बांचते भगवत-गीते -
         राम-लखन के तरकश रीते||
पनपे हरण - मरण  उद्योग, योग - भोग - संयोग - रोग |
काम-क्रोध-मद-लोभ समेटे, भव-सागर में भटके लोग ||
          मनु-नौका में लगा पलीते - 
         राम-लखन के तरकश रीते||
राग - द्वेष - ईर्ष्या  फैले,  हो  रहे  आज  रिश्ते  मैले |
पशुता भी चिल्लाये-चीखे, मानवता का दिल दहले ||
         रक्त-बीज का रक्त न पीते -
         राम-लखन के तरकश रीते||
राह - राह  'रविकर' रमता, मरी - मरी मिलती ममता |
जगह-जगह जल्लाद जुनूनी, भ्रूण चूर्ण कर न थमता ||
         कोख नोचते कुक्कुर-चीते - 
        राम-लखन के तरकश रीते ||
 &          &          &          &
 "भारत के भावी प्रधानमन्त्री"  ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी

युद्ध  हो  या  बाजार
फूटते-दगते बम में भी |
मौत की मौजूदगी और
निकलते दम में भी ||
गलते ग्लेशियर और
जलते मौसम में भी ||
हृदय-पटल पर छपती फोटो
ख़ुशी में और गम में भी  ||


जरुर देंखें ये खून के कतरे --

खून के वे आखिरी कतरे चुए

12 जुलाई 2011 को 25 वाँ मुर्गा कटेगा

Tuesday, 21 June 2011

अंधेर है,अंधेर है

इक्जाम की आदत गई, इकजाम का अब फेर है |
उस समय था काम  पढना, अब, काम ही हरबेर है |
अंधेर है, अंधेर है ||

हर अंक की खातिर पढ़े, हर जंग में जाकर लड़े |
अब अंक में मदहोश हैं, बस जंग-लगना  देर है |                   
अंधेर है, अंधेर है ||     

थे सभी काबिल बड़े, होकर मगर काहिल पड़े |
ज्ञान का अवसान है, अपनी गली का शेर है |
अंधेर है, अंधेर है ||

न श्रेष्ठता की जानकारी, वरिष्ठ जन पर पड़े भारी |
जिंदगी  की  समझदारी,  में  बहुत  ही  देर  है |
अंधेर है, अंधेर है ||

Friday, 10 June 2011

आँखे तनिक भिगोनी हैं

                (१)
छत्तीसगढ़  की  छोडो  कमान  |
जा रही पुलिस कर्मियों की जान |
अन्यथा, आज  दिल्ली से मांगो 
पुलिस-कमिश्नर  सह  जवान || 
                 (२)
सुख-दुःख के अनुभव की खातिर 
 है  जीवन   जैसे  बहुत जरुरी  ||
वैसे, "काले-धन" की खातिर     --
लेनी  चोरों  की  मन्जूरी  || 

                (३)
सोनी   अपनी   सोणी   है |
शकल  जरा  सी  रोनी  है |
दिल्ली के दंगल पर किन्तु--
आँखे तनिक भिगोनी हैं ||
       
                         (४)
राजा हो या रोजी हो, मारन हो या मोझी हो |
कामनवेल्थ या देशी खेल, टू-जी हो या फौजी हो----
लगा रखा था ताला जी,  बहुतै बड़ा घुटाला  जी --
हुआ देश मतवाला जी,  बाबा जँग सँभाला जी ||  

Tuesday, 7 June 2011

दिल्ली के पुलिस-गन, चलो झारखण्ड वन

सामने समर्थ जो, खखोरना व्यर्थ तो |
जो शक्तिहीन  हो,  दुखी हो दींन  हो  ||
केवल उस पर भारी है, पुलिस नहीं बीमारी है ||

वृद्ध हो, बाल हों,  नारियां बेहाल हों |
पब्लिक निर्दोष थी, बिल्कुल मद्होश थी 
नींद से ग्रस्त थी, भूख से पस्त  थी |
अस्त-व्यस्त भागते, अश्रु-गैस दागते--
करती छापामारी है, पुलिस नहीं बीमारी है ||  

गर  बड़ी  वीर है, धीर-व-गंभीर है- 
जोर का जोश है, भीड़ पर रोष है- 
बड़ा मर्दजात है, और औकात है -  
दिल्ली की  पुलिस सुन, सर्विस झारखण्ड चुन-
नक्सल की मुख्तारी है, पुलिस नहीं बीमारी है ||