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Saturday, 7 April 2012

नहीं देखते दोष, स्वार्थ में रविकर अंधे-

अंधे का क्या दोष है, दुनिया नहीं दिखाय ।
मन के नैनो से लखे, गाए खाय-कमाय ।।


गाए खाय-कमाय, काम में अंधा  मानव।
देखे विना विवेक, बने तत्क्षण ही दानव ।


दिखे न कोई श्रेष्ठ, करें मद-गोरख-धंधे ।
नहीं देखते दोष, स्वार्थ में रविकर अंधे ।।  


Sports Illustrated: In 2001, Erik became the first blind man to climb Mt.Everest.

5 comments:

  1. गुप्ताजी स्वार्थ बुरी बला है ! इसमे जमाना मस्त है !

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  2. आपके दोहों की सामर्थ्य ,चिन्तन को शक्ति व प्रेरणा को बल देता है ,मौलिकता साफ दिखती है, प्रशसनीय रचना / शुभकामनायें जी /

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  3. बहुत सार्थक प्रस्तुति...

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  4. बहुत सुंदर बोध भरे दोहे...और चित्र लाजवाब है, बधाई !

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