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Sunday, 8 April 2012

रविकर कैसी लाश, समझती सब कुछ सुल्टा-

उल्टा-पुल्टा कर रही, मौत साल दर साल ।
जीवन को तो खा चुकी, खूब बजावे गाल ।

खूब बजावे गाल, धूप में दाल गलावे ।

 समय-पौध जंजाल, माल-मदिरा उपजावे ।

रविकर कैसी लाश, समझती सब कुछ सुल्टा ।

पर पट्टा दुहराय, मौत को ढोती उल्टा ।।  

6 comments:

  1. जीवन को खाती रही ,वन भी खाये खूब
    उसको भाती जिंदगी , जैसे कोमल दूब
    जैसे कोमल दूब , मांगती कभी न पानी
    जीवन खाती रहे,मौत की क्या जिनगानी !
    सिर्फ आत्मा लूटे,न हाथ लगाती तन को
    मुक्ति दायिनी मौत,मुक्त करती जीवन को

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  2. कमाल का कौशल कमाल के दोहों में .... शुभकामनायें रविकर साहब !

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  3. जीवन और मृत्यु में जंग जारी है,
    समझ लीजिये, प्रलय की तैयारी है।

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  4. बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  5. आपके लेखन का अंदाज शानदार है सर,|आपका आभार की आपने मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल किया |

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  6. निराला अंदाज, उत्तम प्रस्तुति।

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