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Saturday, 2 July 2011

नासमझ सास

नाज  न  पकावै  वा  तौ  नाज  दिखावै है   
लाज  न  आवै  बहू   बाज  न  आवै   है |

झपिया झाँझन झुल्नी   झुलका पहिन के
झाँव-झाँव, झकझोर, झमकत  धावै  है  |
 

छनकाय-मनकाय    कहीं भी  छुछुआय 
खट्टा खखोर करिके, खटिया  पसरावै है |

मिथ्या मिमियाय के , झलना झुलाय कर
पति-आवै जान पावै , पातुर पति-आवै है ||

 


6 comments:

  1. वाह, संवेदनशील विषय चुन लिया है आपने।

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  2. राग अनुपम , आखिरी पंक्ति समझ में नहीं आई !

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  3. बहुत सुन्दर ..गज़ब का लेखन है ..

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  4. आभार |

    पति- आवै = पति आता है
    पति आवै = पति को पतियाती है मतलब अपनी बात मनवाती है ||

    पातुर एक गाली है जो सास चिढ कर अपनी बहू को देती है |

    सास जान नहीं पा रही कि उसकी बहू गर्भ से है
    और वह खाना न बनाने
    एवं आराम से सोने में समय बिता रही है
    --जेवर और ढीले-ढाले कपडे पहन कर |

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  5. वाह! रविकर जी। अद्भुत! अनुप्रास अलकार का जादू बिखेर दिया आपने। पतिआवै में योजक चिन्ह दोनों जगह क्यों डाल दिया?

    पातुर शायद पतुरिया से बना हो जो नचनिया या गानेवाली को कहते हैं। सम्भवत: तवायफ़ को क्योंकि मैंने उमराव ज़ान में रेखा की फिल्मी माँ को पतुरिया कहते सुना है।

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  6. फिर गलती हुई। अलंकार की जगह अलकार लिख दिया।

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