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Tuesday, 12 July 2011

महाराष्ट्र की खबर

सत्वशिला  यानि 
पृथ्वीराज चाह्वान  की  धर्म-पत्नी 
का  पर्स  छिनाया ||

राज  मुस्कराया  --
यह  तो  पहली  बार  है  पृथ्वी --

सोलह  बार  और---
होती  रहे  छिनतई--

पर सत्रह का इन्जार
मत करना मेरे यार
आँखे -- बचा
शोर--मचा

6 comments:

  1. बहुत अच्छी कविता। बधाई।।

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  2. बहुत खूब रविकर भाई .ऐसे प्रसंगों पर तनिक पाद टिपण्णी लिख दिया करें .

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  3. बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

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