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Thursday, 30 June 2011

तुम्हारे सहारे |

गुज़र से   गए दर्दो-एहसास   सारे, तुम्हारे सहारे |
गुजरने लगे रात-दिन फिर हमारे, तुम्हारे सहारे ||
उड़ा न सके राख,
दिल के जले की,
बवंडर  नकारे |

कोई ज्वार-भांटा
              न आया सदी से
           
              समंदर किनारे |

हारे को ' रविकर' 
कि जीता वही
जो सिकंदर पुकारे |

चूँ-चूँ ने  चोंचों से
चुन-चुन के फेंके,
जो जलते अंगारे |

              धड़कने लगा दिल,

              न हिम्मत ये हारे

              न तुमको बिसारे ||
गुजरने लगे रात-दिन फिर हमारे, तुम्हारे सहारे |
गुज़र से गए दर्दो-एहसास सारे,   तुम्हारे सहारे | |

*      *          *          *           *          *     *

अपने आशिक की मैंने

इक तश्वीर बनाई   है ||

जरा  टेढ़ी-मेढ़ी आई है |

पहली में पगड़ी दिखाई है |

दूजी में लुंगी पहनाई है |

तीजी की ड्रेस काली है |

चौथी भोली-भाली हैं --

कुआरें-पन की लाली है |

अगला एक सवाली है ||

जिसका भेजा खाली है ||

एक तस्वीर में चंदा  है 

तो दूसरी में बिहारी बन्दा है ||  


पर तू है कौन ----
ये तो बता --
मैं---
मैं हूँ देश की सत्ता ||

6 comments:

  1. बेहतरीन रचना, वाह।

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  2. गुजरने लगे रात-दिन फिर हमारे, तुम्हारे सहारे
    beautiful poem

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  3. रविकर जी प्यारी रचना -निम्न सुन्दर सन्देश
    हारे को ' रविकर'
    कि जीता वही
    जो सिकंदर पुकारे |

    ये आशिकों का बुरा हाल तो ही ही जाता है आशिकी निभाना कोई ऐरे गिरे नत्थू खैरे के बस की बात नहीं -बेबाक
    कुआरें-पन की लाली है |

    अगला एक सवाली है ||

    जिसका भेजा खाली है ||

    शुक्ल भ्रमर ५

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  4. लीजिए नागरी में कहने आ गया। अब कल वाली बात जो रोमन में है हटा देता हूँ।

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