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Tuesday, 21 February 2012

जब था-ली भर-पेट, देख न मेरी थाली

जिस थाली में खा रहा, करे उसी में छेद ।
छल के छलनी दे बना, सत्तर सत्ता भेद ।

सत्तर सत्ता भेद, सूप की हंसी उडावे  ।
 करे चलय दिग्विजय, ताल से पानी लावे।

अपनी शर्ट सफ़ेद,  दाग से तेरी काली ।
जब था-ली भर-पेट, देख न मेरी थाली ।।

3 comments:

  1. कविवर! कैसे मैं कहूँ, अपने मन के हाल.

    कालिदास ज्यूँ काटते, बैठे अपनी डाल.

    बैठे अपनी डाल गिरन से ना घबराते.

    पंडित पत्नी डांटती हमें आते-जाते.

    सभी व्यंग्य कटाक्ष, घुसे रहते मन वीवर.

    नाप-तोल कर बोलूँ, मजबूरी में कविवर.


    रविकर जी, स्पष्ट कहना और लिखना विवशता बन गया है... लिखेंगे कभी साफ़-साफ़... बेख़ौफ़ होकर.

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  2. गजब की शब्द संरचना, सन्नाट संवाद...

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