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Wednesday, 22 February 2012

प्रवीण जी ने फेसबुक से विदा ली


क्षण भर चेहरे देख के, करें जरूरी काम |
बड़ा मुखौटा काम का, छूटे नशे तमाम |



छूटे नशे तमाम, नशे का बनता राजा |
छोड़ जरुरी काम, बुलाये आजा आजा |



कह रविकर रख होश, मुखौटा खोटे लागै |
रखकर सर पर पैर, सयाना सरपट भागै ||

7 comments:

  1. बहुत सटीक चित्रण...सच में फेस बुक भी एक नशा है...

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  2. आपकी ६ पंक्तियों ने बड़ी ही सरलता से सारा विश्लेषण सामने रख दिया...वाह...

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  3. har kisi ka yah nasha ek na ek din jaroor utrega.praveen ji ke baare me bahut achche dohe likhe aap dono ko hi badhaai.

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  4. बेहतरीन प्रस्तुति

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  5. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-798:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>

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