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Saturday, 1 December 2012

अहं पुरुष का तोड़, आज की सीधी धारा -


सोना सोना बबकना, पेपर टिसू मरोड़ । 
 बना नाम आदर्श अब, अहं पुरुष का तोड़ ।



अहं पुरुष का तोड़, आज की सीधी धारा ।
भजते भक्त करोड़, भिगोकर कैसा मारा ।



हैडन कर हर भजन, भरो परसाद भगोना ।
पेपर टिसू अनेक, मांगते मंहगा सोना ।।


Bitter talk , But real talk


परिवर्तन है कुदरती,  बदला देश समाज ।
बदल सकी नहिं कु-प्रथा,  अब तो जाओ बाज ।


 
 अब तो जाओ बाज, नहीं शोषण कर सकते ।
लिए आस्था नाम, पाप सदियों से ढकते ।


 
दो इनको अधिकार, जियें ये अपना जीवन ।
बदलो गन्दी प्रथा, जरुरी है परिवर्तन ।

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    दो दिनों से नेट नहीं चल रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। आज नेट की स्पीड ठीक आ गई और रविवार के लिए चर्चा भी शैड्यूल हो गई।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (2-12-2012) के चर्चा मंच-1060 (प्रथा की व्यथा) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  2. बहुत ही उम्दा दोहे :)

    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/11/3.html

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  3. अब तो जाओ बाज, नहीं शोषण कर सकते ।
    लिए आस्था नाम, पाप सदियों से ढकते ।


    दो इनको अधिकार, जियें ये अपना जीवन ।
    बदलो गन्दी प्रथा, जरुरी है परिवर्तन ।

    सामाजिक रूप से सार्थक काव्यात्मक लेखन .

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  4. बहुत ही उम्दा ... सामाजिक प्रश्नों पर काव्यात्मक चर्चा ...

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