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Thursday, 18 February 2016

गूँथ स्वयं को मातु, बनाओ तुम तो रोटी-


रोटी सा बेला बदन, अलबेला उत्साह |
दो बेला हर दिन सिके, किन्तु नहीं परवाह |

किन्तु नहीं परवाह, सभी की भूख मिटाती |
पर बच्चे बेलाग, अकेले मर-खप जाती |

कर रविकर को माफ़, हुई यह संतति खोटी |
गूँथ स्वयं को मातु, बनाओ तुम तो रोटी ||


3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-02-2016) को "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल बहाल करें " (चर्चा अंक-2258) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. परम पूज्यवर , बहुत खूब । सादर नमन ।

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