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Monday, 4 June 2012

बाँह पकड़ कर सीधा करती, याद जो आता नाना होता-

चूल्हा-चौका कपट-कुपोषण, 
 मासिक धर्म निभाना होता ।
बीजारोपण दोषारोपण, 
अपना रक्त बहाना होता ।।

नियमित मासिक चक्र बना है, 
दर्द नारियों का आभूषण -
संतानों का पालन-पोषण, 
अपना दुग्ध पिलाना होता ।।

धीरज दया सहनशक्ती में, 
सदा जीतती हम तुमसे हैं -
जीवन हम सा पाते तो तुम , 
तेरा अता-पता ना होता  ।।

सदा भांजना, धौंस ज़माना, 
बेमतलब धमकाना होता ।
बाँह पकड़ कर सीधा करती-
याद जो आता नाना होता ।। 


6 comments:

  1. सदा भांजना, धौंस ज़माना,
    बेमतलब धमकाना होता ।
    बाँह पकड़ कर सीधा करती-
    याद जो आता नाना होता ।
    ...गूढार्थ भरी सुन्दर काव्य रचना!

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  2. यही तो जननी है ! बहुत खूब

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  3. बहुत बढ़िया सटीक लेखन...

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  4. बहुत खूब...

    वर्तनी तो ठीक कर लीजिए कविराज। धाड़ से सोची धडाम से पोस्ट करके फूल ली। पढ़ा भी नहीं।:)

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