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Tuesday, 26 June 2012

कृष्णा की कृपा हुई, बनी टिप्पणी पोस्ट ।

सच कहो...

तन्मय होकर के सुनो, अट्ठारह अध्याय |
भेद खोल दूँ तव-सकल, रहे कृष्ण घबराय |

रहे कृष्ण घबराय, सीध अर्जुन को पाया |
बेचारा असहाय, बुद्धि से ख़ूब भरमाया |

एक एक करतूत, देखता जाए संजय |
गोपी जस असहाय, नहीं कृष्णा ये तन्मय ||

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (१८वीं-कड़ी)

Kailash Sharma
Kashish - My Poetry
 

जन्म-कर्म योगादि पर, बोल रहे गोपाल |
ध्यान पूर्वक सुन रहे, अस्त्र-शस्त्र सब डाल |

अस्त्र-शस्त्र सब डाल, बाल की खाल निकाले |
महाविराट स्वरूप, तभी तो दर्शन पाले |

अर्जुन होते धन्य, धर्म का राज्य आ गया |
गीता का सन्देश, विश्व भर भला भा गया || 



 
चित्रों की खुबसूरती, शब्दों का भावार्थ |
कृष्ण हांकते रथ चले, आनंदित यह पार्थ |

आनंदित यह पार्थ, वादियाँ काश्मीर की |
हजरत बल डल झील, पुराने महल पीर की |

रविकर टिकट बगैर, घूमता जाए मित्रों |
कर लो सब दीदार, आभार अनोखे चित्रों || 

5 comments:

  1. आपकी टिप्पणियों का ज़वाब नहीं...अपने आप में सम्पूर्ण और सुन्दर रचना...

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  2. बहुत सार्थक प्रस्तुति!
    कुण्डलियों की बहार बारहमास बनी रहे!

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  3. आनंदित यह पार्थ, वादियाँ काश्मीर की |
    हजरत बल डल झील, पुराने महल पीर की |
    क्या बात है रविकर जी यह मूल यात्रा वृत्तांत हम पढ़ें हैं .सुन्दर काव्य पुनर प्रस्तुति आपकी .

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  4. काव्य ऐसे ही प्रवाहमान रहे..

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