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Saturday, 16 June 2012

खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग-

ढर्रा बदलेगी नहीं,  रोज अड़ाये टांग ।
खांई में बच्चे सहित, ममता मार छलांग । 
 
'ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी ।
धंसी 'मुलायम' भूमि, भागता मार गुलाटी ।
 
घूर रहा सिंगूर, ढिठाई जर्रा जर्रा ।
बर्रा मारे डंक, बदल ना पाए ढर्रा ।।
 
 

6 comments:

  1. ममता' मार छलांग, भूलती मानुष माटी

    beautifully said

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  2. बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

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  3. राजनीति की निर्मम चालें..

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  4. ममता को तो आपने धो डाला |
    मुलायम को भी नहीं बख्सा |
    बधाई आपको बाबा ||

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  5. राजनीति पर अच्छा निशाना |
    आशा

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  6. घूर रहा सिंगूर, ढिठाई जर्रा जर्रा ।
    बर्रा मारे डंक, बदल ना पाए ढर्रा ।।
    और मदारिन शेष हैं आँख खोल कर देख .....

    पूरी करो रविकर भाई .....शुक्रिया इस रचना के लिए .ये मदारी और मदारिन जिनकी जुबान रोज़ पलटती है देख को और कहाँ ले जायेंगे .मंद बुद्धि को भी मात कर गई निर्ममता की हट,निर बुद्धा निकली पूरी .

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