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Friday, 15 June 2012

कुछ हिट शेरों की भेड़-चाल-


* लू के थपेड़े दें जला रविकर बदन
प्रेम के पेड़े बुझायें आग अब तो ।


*आज बच्चे  खेलते बढ़िया गजट
भूल मत जाना मोबाइल वहां

* कनपटी के केस रविकर पक गए-
कन्या की चिंता बढ़ी सुरसा हुई


*पत्थरों को प्यार से पिघला सके-
जिस्म में वो दिल टूटा सा पड़ा ।

*अस्तित्व का एहसास रविकर कर सका -
वर्ना हवा में उड़ रहा था आज तक ।

*साग सरसों का सभी खाने लगे
बीज ही गायब हुवे  उगते बबूल ।

*जँगले-दरवाजे फर्नीचर बनें
जंगलों की यूँ  हमें दरकार है ।

*धरती गगन को एक करना चाहता
मानवी मकसद युगों से है यही ।

*खून से भी गर सने हों हाथ रविकर
चंद सिक्के जोर से बस मार दो ।

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (16-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  2. कनपटी के केस रविकर पक गए-
    व्याह की चिंता बढ़ी सुरसा हुई
    ..कनपटी के केस पक गये फिर भी ब्याह की चिंता!:)

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  3. ब्याह के बदले बेटियों लिख देते तो भाव आ जाता।

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  4. बढ़िया विचार कनिकाएं व्यंग्य कनिकाएं एक से बढ़के एक .

    *जँगले-दरवाजे फर्नीचर बनें
    जंगलों की यूँ हमें दरकार है ।
    * कनपटी के केस रविकर पक गए-
    व्याह की चिंता बढ़ी सुरसा हुई

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक रचना |
    आशा

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