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Thursday, 30 June 2016

अश्लील दोष

काव्य में किन परिस्थितयों में अश्लील दोष भी गुण हो जाता है.और वह शृंगार 'रस' के घर में न जाकर 'रसाभास' की दीवारें लांघता हुआ दिखायी देता है.
(1)
स्वर्ण-शिखा सी सज-संवर, मानहुँ बढ़ती आग ।
छद्म-रूप मोहित करे, कन्या-नाग सुभाग ।
कन्या-नाग सुभाग, हिस्स रति का रमझोला ।
झूले रमण दिमाग, भूल के बम-बम भोला ।
नाग रहा वह जाग, ज़रा सी आई खांसी ।
गया काम फिर भाग, ताक के स्वर्ण-शिखा सी ।।
(2)
नींद नाग की भंग हो, हिस्स-फिस्स सम शोर।
भंग नशे में शिव दिखे, जगा काम का चोर ।
जगा काम का चोर, बदन दनदना मरोड़े।
सरक गया पट खोल, शिवा की तन्द्रा तोड़े ।
संभोगी आनीत, नीत में कमी राग की ।
आसिक्तत आसक्त, टूटती नींद नाग की ।।
(3)
मांसाहारी मन-मचा, मदन मना महमंत।
पाऊं-खाऊं छोड़ दूँ, शंका जन्म अनंत ।
शंका जन्म अनंत, फटाफट पट पर पैनी ।
नजर चीरती चंट, सहे यह मन बेचैनी ।
चला मारने दन्त, मगर जागा व्यभिचारी ।
फिर जीवन-पर्यंत, चूमता मांसाहारी ।।
(4)
प्रेमालापी नायिका, चाट जाय सब धात ।
खनिज-मनुज घट-मिट रहे, नष्ट प्रपात प्रभात ।
नष्ट प्रपात प्रभात, शांत मनसा ना होवे ।
असमय रही नहात, दुपहरी पूरी सोवे ।
चंचु चोप चिपकाय, नहीं पिक हुई प्रलापी ।
चूतक ना बौराय, चैत्य-चर प्रेमालापी ।।
बहुत बेहतरीन सार्थक जानकारी देती प्रस्तुति,RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,
MANOJIOFS.BLOGSPOT.COM|मनोज कुमार द्वारा

3 comments:

  1. सुन्दर जानकारीपरक पोस्ट

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-07-2016) को "बरसो बदरवा" (चर्चा अंक-2391) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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