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Sunday, 3 March 2013

जब कभी रस्ता चले । फब्तियां कसता चले-

जब कभी रस्ता चले ।
फब्तियां कसता चले ।।

जान जोखिम में मगर-
मस्त-मन हँसता  चले ।।

अब बजट में आदमी -
हो गया सस्ता चले ।।

मौत मंहगी हो गई -
हाल कुछ खस्ता चले ।।

दस किलो की बालिका 
बीस का बस्ता चले |

गुल खिलाते ही रहे 
किन्तु गुलदस्ता चले |

तेज रविकर का बढ़ा -
चाँद पर बसता चले  ॥

12 comments:

  1. अब बजट में आदमी -
    हो गया सस्ता चले ।।

    मौत मंहगी हो गई -
    हाल कुछ खस्ता चले ।।
    बहुत खूब !
    latest post होली

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  2. आदरणीय गुरुदेव श्री प्रणाम, वाह क्या बात है छोटी बहर में शानदार अशआरों को पिरोती लाजवाब रचना हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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  3. बहुत खूब सुन्दर लाजबाब अभिव्यक्ति।।।।।।

    मेरी नई रचना
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

    ये कैसी मोहब्बत है

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  4. आस्तीं में पल रहा
    सर्प सा डसता चले |

    बाँटता है अश्कोगम
    खुद मगर हँसता चले |

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  5. बात मतलब की रविकर
    हमेशा ही करता चले .....!
    मुबारक हो !

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  6. ..रविकर जी!'अब बजट में आदमी -
    हो गया सस्ता चले ।।'...हकीकत है...यथार्थ है...आभार!

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  7. पांच वर्षीय यह आदमी क्या करें ? मजबूर

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  8. बढ़िया गुरुवार | बधाई

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  9. .बहुत ही सुन्दर ,आभार.

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  10. आदमी तो सस्ता पहले ही था आज और सस्ता हो गया,जिंदगी की दुश्वरिओं का भरी बस्ता हो गया ,
    लचर था मजबूर था,खौफ का मज्मूम था पहले ही वो
    आज दर्द का वो एक सिसकत गुलदस्ता हो गया

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  11. जान जोखिम में मगर-
    मस्त-मन हँसता चले ..

    बहुत खूब ... छोटी बहर का कमाल ... हर शेर तीखा ... तेज ... तर्र्रार ... मज़ा आ गया ..

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