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Friday, 1 March 2013

काव्य रचे मतिमंद, मिले जो गुरुवर साँचा-


 साँचा नाचा चतुर्दिक, शब्द अब्द कटि चोज । 
चुने चुनिन्दा चुनरियाँ, सोहै ओज उरोज |

सोहै ओज उरोज, रोज अभ्यास निरंतर |
दूर करे त्रुटि खोज, करे निर्मल तनु-अंतर |

भरे भाव रस छंद, बचे नहिं खाली खाँचा |
काव्य रचे मतिमंद, मिले जो गुरुवर साँचा ||
*चोज=सुभाषित /मजाकिया बात



होता स्वाहा बोल के, समिधा देता डाल ।
खुश होता जब देव वह, देता दुगुना माल ।

देता दुगुना माल , यहाँ पतझर का स्वाहा ।
धरती पर हरसाल, होय वासंतिक हा हा ।

परिवर्तन का दौर, लगा ले भैया गोता ।
जो चाहे प्रभु राम, वही तो हरदम होता । ।
 



7 comments:

  1. कुंडलिओं आयाम देती एक गजल है आ रही ,मॉल क्या हर मॉल में ज्यामितीय बृद्धि करती आ रही है ; सच्चे गुरु गुरु ज्ञानी मिले कुंद बुद्धि खुल जय,मन बनी निर्मल करे,.होवत सज स्वाभाव , बेहतरीन

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  2. जो चाहे प्रभु राम ..
    शुभकामनायें भाई जी !

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  3. बेहतरीन,गुरुवर.

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  4. बढ़िया है..

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है ......
    सादर , आपकी बहतरीन प्रस्तुती

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

    ये कैसी मोहब्बत है

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  6. रविकर जी, यह बात हमेशा सोचता हूँ ... आपकी कविताई नव छंद-अभ्यासियों के लिए काफी अच्छी है।

    कोई भी लेखन विषय आपसे अछूता नहीं रहा होगा। आपका काव्य-मनोबल अद्वितीय है विषय कैसा भी क्यों न हो .. आप उसे छंद साँचे में ऐसा ढालते हैं कि अचरज हुए बिना नहीं रहता।

    आप सारस्वत प्रतिभा के धनी हैं। आपसे अपेक्षा रहती है कि यदा-कदा काव्य-शिक्षण का उपदेश लाभ भी मिले। हम जैसे काव्य-श्रमिकों पर उपकार होगा।

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  7. एक अलग सी छटा..

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