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Tuesday, 12 March 2013

सुनिए यह चित्कार, बुलाये रविकर पातक -

तक तक कर पथरा गईं, आँखे प्रभु जी आज |
कब से रहा पुकारता, बैठे कहाँ विराज  |

बैठे कहाँ विराज,
हृदय से सदा बुलाया । 
नाम कृपा निधि झूठ,
कृपा अब तक नहिं पाया |

सुनिए यह चित्कार, बुलाये रविकर पातक |
मिटा अन्यथा याद, याद प्रभु तेरी घातक ॥ 

6 comments:

  1. वाह सर जी, किसे याद कर रहे हैं ? :)

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  2. बुलाये रविकर पातक...

    ham aa gaye bhai sahab.

    Nice lines.

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  3. पल -पल की स्मृतिओं में है .शेष रविकर की कृतिओं में है ,
    मत पूँछ नाम रे मूढ़ , नाम तुम पढ़ लेना ,तुम पढ़ लेना (गोदियाल जी की टिप्पड़ी से जुड़ा) सुन्दर कुण्डलियाँ

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  4. बहुत ही सुन्दर कुण्डलियाँ,आभार

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  5. रविकर धीरज राखिए,रज मलिये सिर-माथ
    उसकी दुनियाँ में सुनो , कोई नहीं अनाथ
    कोई नहीं अनाथ , कर्म की गति है सारी
    रुदन जहाँ हो आज,वहीं कल हो किलकारी
    धूप-छाँव दिन-रात ,एक-से काटें हँस कर
    प्रभु पर विश्वास ,राखिए धीरज "रविकर" ||

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  6. कृपया अंतिम पंक्ति सुधार कर पढ़ें.......
    प्रभु पर कर विश्वास, राखिए धीरज रविकर

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