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Tuesday, 25 February 2014

दे *दिल्ले में आग, बिगाड़े आप रतालू -

तालू से लगती नहीं, जिभ्या क्यूँ महराज |
हरदिन पलटी मारते,  झूँठों के सरताज  |

झूँठों के सरताज, रहे सर ताज सजाये |
एकमात्र  ईमान, किन्तु दुर्गुण सब आये |

मिर्च-मसाला झोंक, पकाई सब्जी चालू ।
दे *दिल्ले में आग, बिगाड़े आप रतालू ॥

*किवाड़ के पीछे लगा  लकड़ी का चौकोर खूँटा

मोदनीय वातावरण, बाजीगर सर-ताज-

चिड़ियाघर कायल हुआ, बदल गया अंदाज । 
मोदनीय वातावरण, बाजीगर सर-ताज । 

बाजीगर सर-ताज, बाज गलती से आये । 
लेकिन गिद्ध समाज, बाज को गलत बताये । 

कौआ इक चालाक, बाँट-ईमानी पुड़िया । 
मिस-मैनेज कर काम, रोज भड़काए चिड़िया ॥ 

3 comments:

  1. तालू से लगती नहीं, जिभ्या क्यूँ महराज |
    हरदिन पलटी मारते, झूँठों के सरताज |

    झूँठों के सरताज, रहे सर ताज सजाये |
    एकमात्र ईमान, किन्तु दुर्गुण सब आये |

    मिर्च-मसाला झोंक, पकाई सब्जी चालू ।
    दे *दिल्ले में आग, बिगाड़े आप रतालू ॥

    बढ़िया व्यंग्य श्रीमान आलू जी पर जो शैफर्ड प्रधानमन्त्री बनने के खाब देख रहें हैं .

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  2. 'मिर्च-मसाला झोंक, पकाई सब्जी चालू ।'
    - बेचारे की पोल खुली जा रही है !

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  3. वाह भई वाह !

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