Friday, 6 April 2012

पिता, पुत्र पति में बही व्यर्थ समय की रेत-

veerubhai at ram ram bhai

पर मेरी टिप्पणी

अधिकारों के प्रति रहे, 
मुखरित और सचेत |
पिता, पुत्र पति में बही 
व्यर्थ समय की रेत |

व्यर्थ समय की रेत 
बराबर हक़ पायी है |
आजादी के गीत, 
जोर से अब गायी है |

चाल-ढाल ड्रेस वाद, 
थोपिए अब न इनपर |
माँ क्या जाने आज, 
नारियां चलती तनकर ||

Wednesday, 4 April 2012

किन्तु जहर मत डाल, असर प्यारों पर पारे

खिले बगीचे फूल संग, अनचाहे पतवार ।
जैसे घर-संसार में, लें आकार विकार । 


 

लें विकार आकार , उखाड़ो जड़ से सारे ।
किन्तु जहर मत डाल, असर प्यारों पर पारे ।


है जीवन की सीख, नीच जब रहे लंगीचे ।
तब सु-मनों का मूल्य, समझते खिले बगीचे ।। 


Tuesday, 3 April 2012

चूमा-चाटी कर रहे, उत्सव में पगलान

श्री संतोष जी त्रिवेदी का आभार 

मिली प्रेरणा 

 बैशाख और मेघा / माघ


मेघा को ताका करे, नाश-पिटा बैसाख ।
करे भांगड़ा तर-बतर, बट्टा लागे शाख ।
बट्टा लागे शाख, मुटाता जाय दुबारा ।
पर नन्दन वैशाख,  नहीं मेघा को  प्यारा ।
मेघा ठेंग दिखाय, चिढाती  कहती  घोंघा ।
ठंडी मस्त बयार, झिड़कती उसको मेघा ।।   

 चित्रा (चैत्र)


चित्रा के चर्चा चले, घर-आँगन मन हाट ।
ज्वार जवानी कनक सी, रही ध्यान है बाँट ।
रही ध्यान है बाँट,  चूड़ियाँ साड़ी कंगन ।
जोह रही है बाट, लाट होंगे मम साजन ।
फगुनाहटी सुरूर, त्याग अब कहती मित्रा ।
विदा करा चल भोर, ताकती माती-चित्रा ।।

आश्विन और कार्तिक

चूमा-चाटी कर रहे,  उत्सव में पगलान ।
डेटिंग-बोटिंग में पड़े, रेस्टोरेंट- उद्यान ।
रेस्टोरेंट- उद्यान, हुवे खुब कसमे-वादे ।
पूजा का माहौल, प्रेम रस भक्ति मिला दे ।
नव-दुर्गा आगमन, दिवाली जोड़ा घूमा ।
पा लक्ष्मी वरदान, ख़ुशी से माथा चूमा ।।

चल बिखेर मुस्कान, जिंदगी होगी स्वारथ -


सकल पदारथ भोगता, हँसा नहीं इक पाख ।
मनोरोग है व्यक्ति को, बुद्धिमान हो लाख । 

बुद्धिमान हो लाख, भला ऐसा क्या जीना ।
पागलपन है शाख, अगरचे  हंसना छीना ।

चल बिखेर मुस्कान, जिंदगी होगी स्वारथ ।
बन सच्चा इंसान,  लूट ले सकल पदारथ ।। 





Monday, 2 April 2012

सदा जरुरत पर सुनता है, उल्लू गधा कहो या रविकर

विद्वानों से डर लगता है , उनकी बात समझना मुश्किल ।
आशु-कवि कह देते पहले, भटकाते फिर पंडित बे-दिल ।

 अच्छा है सतसंग मूर्ख का, बन्दर तो  नकुना ही काटे -
नहीं चढ़ाता चने झाड पर, हंसकर बोझिल पल भी बांटे ।

सदा जरुरत पर सुनता है, उल्लू गधा कहो या रविकर  
मीन-मेख न कभी निकाले, आज्ञा-पालन को वह तत्पर ।

प्रकृति-प्रदत्त सभी औषधि में, हँसना सबसे बड़ी दवाई ।
अपने पर हँसना जो सीखे, रविकर देता उसे बधाई ।। 

मर्यादित व्यवहार, ज्येष्ठ से हरदम इच्छित -

  फागुन और श्रावणी

फागुन से मन-श्रावणी,  अस्त व्यस्त संत्रस्त
भूली भटकी घूमती,  मदन बाण से ग्रस्त ।

मदन बाण से ग्रस्त, मिलन की प्यास बढाये ।
जड़ चेतन बौराय, विरह देहीं सुलगाये ।

तीन मास संताप, सहूँ मै कैसे निर्गुन ?
डालो मेघ फुहार, बड़ा तरसाए फागुन ।।
 
आश्विन और ज्येष्ठ
आश्विन की शीतल झलक, ज्येष्ठ मास को भाय।
नैना तपते रक्त से, पर आश्विन  इठलाय ।

पर आश्विन इठलाय, भाव बिन समझे कुत्सित।
मर्यादित व्यवहार, ज्येष्ठ से हरदम इच्छित ।

मेघ देख कर खिन्न, तड़पती तड़ित तपस्विन ।
भीग ज्येष्ठ हो शांत , महकती जाती आश्विन ।।

Sunday, 1 April 2012

सपना मिडिल क्लास, देखता कैसे कैसे

 
इ'स्टेटस सिम्बल बना, नवधनाढ्य का एक । 

मस्त दुकानें चल रहीं, बाबा बैठ अनेक । 



बाबा बैठ अनेक, दलाली करते आधे ।
फँसते ग्राहक नए, सभी को बाबा साधे ।

सपना मिडिल क्लास, देखता कैसे कैसे  ।
चाहत बने अमीर, लुटा के अपने पैसे ।।