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Wednesday, 11 July 2012

रविकर करे ठिठोलियाँ, खाय गालियाँ खूब-

 
 उनकी मदिरा सोमरस, इज्जत करे समाज ।
रविकर पर थू थू करे, जो खाया इक प्याज ।।

 बाइक को पुष्पक कहे , घूमे मस्त सवार ।
 रविकर का वाहन लगे, उसे खटारा कार ।

रविकर आदर भाव का, चाटुकारिता नाम ।
नजर हिकारतमय वहां, ठोके किन्तु सलाम ।।

रविकर के चुटुकुले भी, लगते हैं अश्लील ।
मठ-महंत के हाथ से, कर लें वे गुड-फील ।।


  जालिम कर दे क़त्ल तो, वे बोले इन्साफ ।
रविकर देखा भर-नजर, नहीं कर सके माफ़ ।।

रविकर करे ठिठोलियाँ, खाय गालियाँ खूब ।
पर उनके व्यभिचार से, नहीं रहा मन ऊब ।। 


रविकर की पूजा लगे, ढकोसला आटोप ।
खाए जूता-गालियाँ, करे न उनपर कोप ।।

रविकर चूल्हा कर रहा, प्रर्यावरण खराब ।
उनकी जलती चिता को, हवन कह रहे सा'ब ।।

 तूफानी गति ले पकड़, रविकर  इक अफवाह ।
उनके घर का तहलका, शीतल पवन उछाह ।।

हकीकतें रविकर भली, पर घमंड हो जाय ।
वहां अकड़पन स्वयं  की, बोल्डनेस कहलाय ।।


उनकी दादा-गिरी भी, रविकर रहा सराह  ।
किन्तु हमारी नम्रता,  दयनीयता कराह ।। 

 सहे छिछोरापन सतत, हर चैंबर में जाय ।
हाय बाय रविकर करे,  पकड़ कान दौड़ाय ।।

12 comments:

  1. Khari khari bin kahe RAVIKAR reh n paaye,
    jalne wale kachu kahe,mat kar tu parwah

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  2. कविराज आहत लगते हैं।:)

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  3. रविकर लंबी तान के,चादर ओढ़ के सोय|
    बिरथा ही हलकान हो,भैंस के आगे रोय||

    भैंस के आगे रोय,बिगाड़े काम आपना |
    दुनियादारी छोड़,ब्लॉग का यही फ़साना ||

    कह चंचल कविराय,खुश रहे हमसे मिलकर|
    छोड़ पुराने राग,बजा तू बंसी रविकर ||

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    1. रचिपचि रचना रच रहा, रुचिकर रस रचितव्य |
      हूर हूर हर-हूर हठ, जल रविकर जस -हव्य |
      जल रविकर जस -हव्य, हुआ जो भस्म अनंगा |
      गंगाधर आभार, बहाई शीतल गंगा |
      धन्यभाग अब गुप्त, सुप्त या लुप्त रहूँ मैं |
      अपने मन की लगन, स्वयं से रोज कहूँ मैं ||

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  4. गालियाँ खाने के लिये भी कलेजा चाहिये
    रविकर ज्यादा हो गयीं हैं अगर आपके पास
    कुछ हमें भी उसमें से दे जाईये ।

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  5. ये गिन गिन के गाली पुराण किस पर खाली हो रहा है -उद्धत रचना

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    1. सादर नमन गुरुवर |
      अन्तर्यामी हैं आप |
      जय बाबा बनारस ||

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  6. post aur tippaniyan sabhi streey hain.

    http://mushayera.blogspot.com/2012/07/blog-post_10.html

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