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Friday, 20 July 2012

ताक रहे फिर रोम, सकल कुल नेहरु गाँधी

करे खुदाई कुछ नहीं, खड़े देवगण व्योम ।
एक बार दिल्ली तकें, ताक रहे फिर रोम ।

ताक रहे फिर रोम, सकल कुल नेहरु गाँधी ।
ब्रह्मलोक हथियाय,  नियन्ता-मेधा बाँधी ।

किंकर्तव्यविमूढ़ , देव गौड़ा की नाई ।
आँख-मूंद मन-मौन, जड़ों की करे खुदाई ।।

5 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत सुन्दर...

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  3. नजर पड़ते ही जड़ देता है
    रविकर देता है तो खींच कर देता है !!

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  4. बहुत खूब ...
    व्यंग्य भरी सुंदर शैली ...

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

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