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Saturday, 7 July 2012

मित्र संतोष त्रिवेदी का आभार--


उन्होंने सचित्र जानकारी उपलब्ध कराई -
जन्संदेश टाइम्स में प्रकाशित 
कुंडली-

चाहत पूरी हो रही, चलती दिल्ली मेल |
राहत बंटती जा रही, सब माया का खेल |

सब माया का खेल, ठेल देता जो अन्दर |
 कर वो ढील नकेल, छोड़ता छुट्टा रविकर |


पट-नायक के छूछ, आत्मा होती आहत |

मानसून में पोट, नोट-वोटों की चाहत ||

3 comments:

  1. आपकी रचनाएँ ही समर्थ हैं स्थान पाने के लिए...बधाई !

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