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Friday, 3 January 2014

परिवर्तन का दौर, काल की घूमी चकरी-

फरी फरी मारा किया, घरी घरी हड़काय । 
मरी मरी जनता रही, दपु-दबंग मुस्काय । 

दपु-दबंग मुस्काय, साधु को रहा सालता। 
लेकिन लगती हाय, साल यह बला टालता । 

परिवर्तन का दौर, काल की घूमी चकरी । 
अब जनता सिरमौर, कालिका जमकर बिफरी ॥ 

11 comments:

  1. परिवर्तन की यह लहर शुभता को लाये

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (04-01-2014) को "क्यों मौन मानवता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1482 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन हिंदी ब्लॉग्गिंग और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. बहुत सुन्दर :)
    नया वर्ष २०१४ मंगलमय हो |सुख ,शांति ,स्वास्थ्यकर हो |कल्याणकारी हो |
    नई पोस्ट विचित्र प्रकृति
    नई पोस्ट नया वर्ष !

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  5. Ravi ji apka jabab nahi ....maja aa gaya

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  6. वाह...बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो

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