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Thursday, 14 February 2013

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -7

अब-तक 
दशरथ की अप्सरा-माँ स्वर्ग गई दुखी पिता-अज  ने आत्म-हत्या करली । पालन-पोषण गुरु -मरुधन्व  के आश्रम में नंदिनी का दूध पीकर हुआ । कौशल्या का जन्म हुआ-कौसल राज के यहाँ -
रावण ने वरदान प्राप्त किये-कौशल्या को मारने की कोशिश-दशरथ द्वारा प्रतिकार-दशरथ कौशल्या विवाह-रावण के क्षत्रपों का अयोध्या में उत्पात 
सर्ग-2
भाग-1

 कौशल्या भयभीत हो, ताके सम्बल एक । 
  पावे रक्षक भ्रूण का,  फैले शत्रु अनेक || 
 

चारों  दिशा  उदास  हैं,  फैला  है आतंक |
जिम्मेदारी कौन ले,  मारे  दुश्मन  डंक ||  

 

सारे देवी-देवता, चिंतित रही मनाय |

 अनमयस्क फिरती रहे, बैठे मन्दिर जाय  ||



जीवमातृका  वन्दना, माता  के  सम पाल |

जीवमंदिरों को सुगढ़, रखती रही संभाल ||

 

धनदा  नन्दा   मंगला,   मातु   कुमारी  रूप |

बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||



माता  करिए  तो  कृपा, करूँ तोर अभिषेक  |

 शत्रु दृष्टि से ले बचा, बच्चा पाऊं नेक ||


 संध्या को रनिवास में, रानी रह-रह रोय |

उच्छवासें भरती रही, अँसुवन धरती धोय ||



दशरथ को दरबार में, हुई घरी भर देर |

कौशल्या नहिं दीखती, अन्दर घुप्प-अंधेर ||



तभी सुबकने की पड़ी, कानों में आवाज |

दासी पर होते कुपित, पूँछ रहे महराज  ||



हुआ उजाला कक्ष में, मुखड़ा लिए मलीन |

रानी लेटी भूमि पर, दिखती अति-गमगीन ||


राजा विह्वल हो गए, संग भूमि पर बैठ |

रानी को पुचकारते, सत्य प्रेम की पैठ ||



 बोलो रानी बेधड़क, खोलो मन के राज |

 कौन रुलाया है तुम्हें, करे कौन नाराज ??
निकले अगर भड़ास तो, बढती जीवन-साँस ।
आँसू बह जाएँ अगर, घटे दर्द एहसास ।। 


 


मद्धिम स्वर फिर फूटता, हिचकी होती तेज |

अपने बच्चे को भला, कैसे रखूं सहेज ||



राजा सुनकर हर्ष से, रानी को लिपटाय |

बोले चिंता मत करो, करूं सटीक उपाय ||



अगली प्रात: वे गए, गुरु वशिष्ठ के पास |

थे सुमंत भी साथ में, जिन पर अति-विश्वास ||



ठोस योजना बन गई, दुश्मन धोखा खाय ||

रानी के इस गर्भ को, जग से रखें छुपाय  ||


अगले दिन दरबार में, आया इक सन्देश |

कौशल्या की मातु को, पीड़ा स्वास्थ-कलेस ||



डोली सजकर हो गई, कौला भी तैयार |

छद्म वेश में सेविका, बैठी अति-हुशियार ||




वक्षस्थल पर झूलता, वही पुराना हार |

जिसको लेकर था भगा, सुग्गासुर अय्यार ||



सेना के सँग हो विदा, डोली चलती जाय |

गिद्धराज ऊपर उड़े, पंखों को फैलाय ||



अभिमंत्रित कर महल को, कौशल्या के पास |

कड़ी सुरक्षा में रखा, दास-दासियाँ ख़ास ||



खर-दूषण के गुप्तचर, छोड़े अपनी खोह |

डोली के पीछे लगे, लेने को तब टोह ||



छद्म-वेश में माइके, धर कौशल्या रूप |

रानी हित दासी करे, अभिनय सहज अनूप ||



वर्षा-ऋतु फिर आ गई, सरयू बड़ी अथाह |

दासी उत्तर में रही, दक्षिण में उत्साह ||


देख सकें औलाद को, हुई बलवती चाह |

दशरथ  सबपर  रख  रहे, चौकस कड़ी निगाह ||



सात मास बीते मगर, गोद-भराई भूल |

कनक महल रक्षित रहा, रानी के अनुकूल ||



पड़ा पर्व नवरात्रि का, सकल नगर उल्लास |

कौशल्या नहिं कर सकी, पर अबकी उपवास ||

 

रानी आँगन में जमी, काया रही भिगोय | 
  शरद पूर्णिमा हो चुकी, अमाँ अँधेरी होय ।। 

हर्षित होता अत्यधिक,  कुटिया में जब दीप ।
विषम परिस्थिति में पढ़े, बच्चे बैठ समीप ।।

माटी की इस देह से, खाटी खुश्बू पाय ।
तन मन दिल चैतन्य हो, प्राकृत जग  हरषाय ।।

कुंडलियाँ  
देह देहरी देहरे,  दो, दो दिया जलाय ।
कर उजेर मन गर्भ-गृह, कुल अघ-तम दहकाय । 
कुल अघ तम दहकाय , दीप दस घूर नरदहा ।
गली द्वार पिछवाड़ , खेत खलिहान लहलहा ।
देवि लक्षि आगमन, विराजो सदा केहरी ।
सुख सामृद्ध सौहार्द, बसे कुल देह देहरी ।। 

किरीट  सवैया ( S I I  X  8 )


झल्कत झालर झंकृत झालर झांझ सुहावन रौ  घर-बाहर ।
  दीप बले बहु बल्ब जले तब आतिशबाजि चलाय भयंकर ।
 दाग रहे खलु भाग रहे विष-कीट पतंग जले घनचक्कर ।
नाच रहे खुश बाल धमाल करे मनु तांडव  हे शिव-शंकर ।।


धीरे धीरे सर्दियाँ , रही धरा को घेर |

शीत लहर चलने लगी, यादें रही उकेर ||



पीड़ा झूठे प्रसव की, होंठ रखे  वो भींच |

रानी सिसकारी भरे, जान सके नहिं नींच ||

 

रानी हर दिन टहलती, करती  नित व्यायाम |

पौष्टिक भोजन खाय के, करे तनिक आराम ||





कोसलपुर में उस तरफ, दासी का वह खेल |

खर-दूषण का गुप्तचर, रहा व्यर्थ ही झेल ||



शुक्ल फाल्गुन पंचमी, मद्धिम बहे बयार |

सूर्यदेव सिर पर जमे, ईश्वर का आभार ||



पुत्री आई महल में, कौशल्या की गोद |

राज्य ख़ुशी से झूमता, छाये मंगल-मोद ||



एक पाख के बाद में, खबर पाय दश-शीस |

खर दूषण को डांटता, सुग्गा सुर पर रीस ||


कन्या के इस जन्म से, रावण पाता चैन |

डपटा क्षत्रपगणों को, निकसे तीखे बैन || 



छठियारी में सब जमे, पावें सभी इनाम |

स्वर्ण हार पाए वहां, दासी का शुभ काम ||

गिद्धराज गिद्धौर को, कर दशरथ का काम |
सम्पाती से जा मिले, करते शोध तमाम ||

नई-नई दूरबीन से, देख सकें अति दूर |
प्रक्षेपित कर यान को, भेजें देश सुदूर ||



मालिश करने के लिए, पहुंची कौला धाय |

छूते ही इक पैर को, सुता रही अकुलाय ||

 


कौशल्या ने वैद्य को, झटपट लिया बुलाय |

जांच परख समुचित करे, रहा किन्तु सकुचाय ||



एक पैर में दोष है, कन्या होय अपंग |

सुनकर अप्रिय वचन यह,  हो कौशल्या दंग ||
लिंक -
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -1
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -2
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -3
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-5

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता-6-B


दिनेश चन्द्र गुप्ता ,रविकर 
निवेदन :
आदरणीय ! आदरेया  !!
 आपकी सलाह का स्वागत है-

5 comments:

  1. बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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  2. भावों से आच्छादित .धाराप्रवाह सुन्दर और ,मार्मिक
    प्रस्तुति

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  3. Thanks for sharing, nice post! Post really provice useful information!

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