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Saturday, 10 March 2012

चलो एकला, आया था जस, सबकी नैया लगी किनारे -

न पढ़ें कविता समझकर 

झेल अकेले खेल प्रभू  के, 
रेल ले गई अपने सारे ।
बेटा तो परदेश कमाता, 
पहले शेखी सदा बघारे ।।

होली में तनु-मनु का आना, 
झाँसी-झाँसा लक-लखनौआ
माँ को अपने साथ ले गई, 
भटके तन-मन द्वारे द्वारे ।।  

चलो एकला, आया था जस,
सबकी नैया लगी किनारे ।
सपने जीते बना कैरियर, 
रविकर तनहा हारे हारे ।।

7 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला ,चल अकेला चल अकेला ,तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला .. हज़ारों मील लम्बे रस्ते तुझको बुलाते ,यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते ,यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला ,चल अकेला चल अकेला चल अकेला ,तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला .

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

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  4. छोड़ निराशा पालें आशा
    राह मनोहर सांझ सकारे
    तन्हाई में साथ प्रभु का
    होता है आभास सखा रे

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  5. सबका एक साथ मिल बैठना तो बनता है होली में..

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  6. वाह बेहतरीन !!!!
    ...........अच्छी प्रस्तुति!

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