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Sunday, 25 March 2012

पढ़ा लिखा भूगोल, देखता दिन में तारे -



भायी दीक्षित बुद्धि की, रचना हमें अपार ।

जोड़-गाँठ करते चला, मानव बारम्बार ।



मानव बारम्बार, भूलता छक्का-पंजा ।

ज्ञान भला विज्ञान, कसे हर रोज शिकंजा |


पढ़ा लिखा भूगोल, देखता दिन में तारे ।

तर्क-शास्त्र मजबूत, बाल की खाल उतारे । 

3 comments:

  1. सच ही है, क्या देखा, क्या पाया।

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  2. रविकर जी, मेरी प्रस्तुति को सम्मान देने के लिए आभार

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  3. बहुत सच कहा है...आभार

    http://aadhyatmikyatra.blogspot.in/

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