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Thursday, 3 May 2012

हर बार, पहले से हमें कमजोर पाओगे यहाँ -

 परदेसी बेटे से -

कंटकाकीर्ण 
उस कठिन पथ पर ।
चलता रहा गोदी उठाकर ।
अक्षरों की भीड़-भारी-  
निर्भय किया-
परिचय कराकर ।

था जीत का आनंद देता -   
खेल में खुद को हराकर । 
पहली दफा स्कूल भेजा 
बाइक  पर आगे बिठाकर ।

प्रतियोगिताएँ जीत लेते 
कठिनतम अभ्यास कर-कर ।
 आज कालेज से निकलकर -
बस गए परदेश जाकर ।

पर-साल जब परदेश से, आओगे तुम गर्मियों में।
देखोगे ये गंग-जमुना, 
और दूषित हो गई ।
कैसे पाओगे नहा ।। 

कंधे झुके चश्मा लगा , झुर्रियां बढती चली-
हड्डियाँ भी गल रहीं ।
हर बार, पहले से हमें-
कमजोर पाओगे यहाँ ।।



7 comments:

  1. हर बार, पहले से हमें-
    कमजोर पाओगे यहाँ ।।
    मार्मिक पोस्ट जो भाव विहल कर गई |

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  2. अब सुख की अपेक्षा कैसी?...मर्म वेधक,सार्थक रचना!

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  3. हर बार, पहले से हमें-
    कमजोर पाओगे यहाँ ।।
    हरगिज़ न ,आवोगे यहाँ
    तुम खुश रहओ ,रहो जहां .
    अच्छी भाव प्रस्तुति .

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  4. बिस्मिल्लाह से बिस्मिल तक सब भा गए ,

    चर्चा में रविकर छा गए .

    आज की चर्चा के लिए विशेष शुक्रिया भाई साहब .

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

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  6. हर वर्ष बस यही आस रहती है।

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  7. मार्मिक रचना ....
    आभार भाई जी ...

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