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Wednesday, 16 May 2012

"नो-डिमांड" हो द्वाराचार -

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मरघट का सन्नाटा था कल, 

आज लगा मछली बाजार ।

File:An Brueghel the Elder-Great Fish market.jpg

जो बन्दा कल तक गम खाया,  

मना रहा नौ-नौ त्यौहार ।

Sangeet Ceremony







भकुवायल ताका करता था, 

गाता चला राग मल्हार  ।

sita vivah

बेटी का जयमाल कराया, 

"नो-डिमांड" हो द्वाराचार ।।

5 comments:

  1. वाह, बहुत ही सुन्दर रचना।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति!
    चित्र भी बढ़िया हैं!

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  3. sunder abhivyakti ..!
    shubhkamnayen ...!!

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  4. मरघट का सन्नाटा था कल,

    आज लगा मछली बाजार ।
    विरोधाभास अलंकार .बढ़िया प्रस्तुति .

    शुक्रवार, 18 मई 2012
    ऊंचा वही है जो गहराई लिए है
    ऊंचा वही है जो गहराई लिए है

    जो गहरा है वही ऊंचा है

    अब समुन्दर को ही लो अपने आकार को मन माफिक घटा बढा लेता है .कितना बड़ा संसार है समुन्दर के अन्दर यदि वह सतह पर आजाये तो समेटे न समेटा जाए .शार्क , वेळ तो बस एक प्रतीक भर हैं उस संघर्ष और जिजीविषा के जो अनवरत सतह के नीचे चलता रहता और सतह पर उस संघर्ष का कोई चिन्ह नहीं कोई संकेत नहीं यदा कदा सुनामी आती है तो उसकी वजह भी खुद समुन्दर नहीं होता सब -डकशन अर्थ कुएक (Subduction earthquake) होता है .समुन्दर के नीचे 10 -11 किलोमीटर की गहराई पर अधिक दाब पर उच्चतर तापमान ४५०सेल्सियस पर उबलते पानी में भी जीव हैं ..इतना समोने की आदत है समुन्दर में है तो समेटने की भी है आकार को चाहे तो आणविक क्या नेनो स्केल पर लेकर चला आये .लेकिन समुन्दर की असल चीज़ उसकी गहराई है जो उसे विशाल हृदय बनाती है पनाह का दया का करुणा का सागर बनाती है .खाद्य का भी सागर है समुन्दर यदि एल्गी को ही खाद्य बना दिया जाए तो सारे जहां का पेट भर जाए .

    अपने मृत जीवों को भी पारसियों से आगे निकलके समुन्दर पेट्रोलियम पदार्थों में बदल देता है .और इसीलिए ऊंचा भी वही है जो गहरा है ,जो ऊंचा दिखता है या अपने को ऊंचा कहता समझता है वह ऊंचा यथार्थ में है नहीं .

    एक बहुत बड़ी बात हुई है जापान ने देखते ही देखते अपने सारे एटमी बिजली घर बंद कर दिए हैं .एक फुकुसीमा त्रासदी और बस .

    अतीत में भी एटमी तबाही से नष्ट होकर जापान एक बार फिर खड़ा हो गया था . जहां संकल्प है वहां सब कुछ है .अमरीका में सबसे ज्यादा घंटा प्रतिदिन काम करने वालों में जापानी शीर्ष पर है .और वही एटमी अश्त्र रखने के भी शायद अधिकारी हो सकते थे लेकिन उन्होंने अमरीकी न्यूक्लियर अम्ब्रेला को ही अपने लिए पर्याप्त समझा बूझा .

    बात साफ़ है जो समुन्दर की तरह गहरा है ,ऊंचा है फिर चाहे वह कोई देश हो या कोई शख्शियत वह एटमी अश्त्र रखे .

    बौने क्या कर रहें हैं इन अश्त्रों का .?

    क्या यह नहीं हो सकता पहले चरण में सभी एटमी असलाह को डिफ्यूज करके संवर्धित युरेनियम एटमी भट्टियों में प्रयुक्त किया जाए और कालान्तर में इसके विकल्प खोज लिए जाए .पृथ्वी को भी सांस लेने दिया जाए .

    समुन्दर की विरा -ट -त़ा का भी नाजायज़ फायदा न उठाया जाए .एटमी कचरा गहराई में दफन करके .जहाज़ों में चोरी छिपे भेजके गरीब देशों को .समुन्दर सब देख रहा है .ऊंचाई से सब दिखाई देता है लेकिन वह ऊंचाई समुन्दर वाली होनी चाहिए .

    किसी देश को आज यह हक़ हासिल नहीं है वह एटमी अश्त्र रखे शेष को हडकाए .ईरान की तरह .बेहतर हो समुन्दर के हवाले कर दें .वही मार्ग दर्शक बनेगा .


    किसी ने देखा है समुन्दर को अपना आपा खोते .अपनी सहनशीलता खोते .

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  5. शुक्रवार, 18 मई 2012
    ऊंचा वही है जो गहराई लिए है
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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