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Friday, 4 October 2013

शान्त *चित्ति के फैसले, करें लोक कल्यान-

शान्त *चित्ति के फैसले, करें लोक कल्यान |
चिदानन्द संदोह से, होय आत्म-उत्थान |

होय आत्म-उत्थान, स्वर्ग धरती पर उतरे |
लेकिन चित्त अशान्त, सदा ही काया कुतरे |

चित्ति करे जो शांत, फैसले नहीं *कित्ति के |
करते नहीं अनर्थ, फैसले शान्त चित्ति के ||

चित्ति = बुद्धि 
कित्ति = कीर्ति / यश

6 comments:

  1. होय आत्म-उत्थान, स्वर्ग धरती पर उतरे |
    लेकिन चित्त अशान्त, सदा ही काया कुतरे |
    ........ परम सत्य ..आदरणीय रविकर सर!

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (05-10-2013) को "माता का आशीष" (चर्चा मंच-1389) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुन्दर शब्द समायोजन काव्यात्मक अंदाज़ में कुंडली का .

    चित्ति करे जो शांत, फैसले नहीं *कित्ति के |
    करते नहीं अनर्थ, फैसले शान्त चित्ति के ||

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  4. करते नही अनर्थ फैसले सांत चित्ति के। सही कहा, शांति में ही सुख है.

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