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Wednesday, 9 October 2013

इत खुशियाँ उत रोष, बिछी अट्ठावन लाशें-

बाथे-नरसंहार का, मिट जाता कुल दोष |
उलट गया अब फैसला, इत खुशियाँ उत रोष |

इत खुशियाँ उत रोष, बिछी अट्ठावन लाशें |
तड़प रहीं दिन रात, कातिलों तुम्हें तलाशें |

माना तुम निर्दोष, क़त्ल फिर किसके माथे |
मांग रहा इन्साफ, पुन: लक्ष्मण पुर बाथे |

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