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Wednesday, 4 December 2013

भूल जाय दुष्कर्म, भक्त की चेते सेना-


(1)
पेशी साईँ की इधर, फूल बिछाते फूल |
सेना है नारायणी, साईँ करो क़ुबूल |

साईँ करो क़ुबूल, किन्तु नहिं जुर्म कबूला |
झोंक आँख में धूल, सतत दक्षिणा वसूला |

बेशक नारा ढील, किन्तु फॉलोवर वेशी |
भागा लाखों मील, हुई दिल्ली में पेशी ||


(2)
सेना जब नारायणी, दुर्योधन के संग |
टिका रहे कुरुक्षेत्र में, कामी संत मलंग |

कामी संत मलंग, अंग से अंग लगाये |
किन्तु करे न जंग, व्यर्थ बहुरुपिया धाये |

गदा उठा ले भीम, कमर के नीचे देना |
भूल जाय दुष्कर्म, भक्त की चेते सेना ||

5 comments:

  1. जबरदस्त ... सटीक ... सामयिक ...
    आनंद आ गया ...

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  2. वाह बहुत सुंदर कुण्डलियां !

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  3. बहुत सुन्दर कुण्डलियां

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (06-12-2013) को "विचारों की श्रंखला" (चर्चा मंचःअंक-1453)
    पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बहुत सुंदर कुंडलियाँ.

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